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सोमवार, 26 जून 2017

भिखारी के कल्पना की कहानी

एक भिखारी था भिक्षाटन से जो कुछ भी धन मिलता उसे वो संचित करता और उस संचित धन से अपने भविष्य सुधारने की योयना बनाते रहता. पुराने ज़माने में भिक्षाटन करने वालों को भीख में आनाज ही मिला करता था. चावल और आटा जैसे अन्न जो क्षुधा निवारण के लिए सबसे उपयुक्त और सुलभ थे लोग भिक्षादान में अधिकांशत: उपयोग किया करते थे .

भिखारी दिन भर घूमता और लोगों से भीख में जो धन आदि मिलता उसे लाकर अपने कुटिया में खूंटी के ऊपर लटका देता. खूंटी पर लटकी अनाज की मटकी एक तो अन्न को चूहों से सुरक्षित रखती और दूसरी उस याचक के स्वप्नील कल्पना को बल भी प्रदान करती . इसी तरह उसने अपने कटिया में अनाजों की परिधि बना लिए. अबतो उसकी कुटिया में चारो तरफ मटकियाँ ही मटकियाँ लटकी थीं .

एक दिन भिखारी अपने कुतिया में लटके हुए मटकियों को देख कर बहुत प्रसन्न हुआ .अपने मन में वह अपने सुन्दर भविष्य के बारे में सोचने लगा. मेरे पास इतने अन्न हो गए हैं अब मैं इन्हें बेचकर बहुत सारी मुद्राएँ अर्जित कर सकता हूँ . इन मुद्राओं से में सुख और वैभव के बहुत से साधन खरीदूंगा . इसतरह मुझे कोई धनी व्यक्ति मुझे अपनी कन्या दे देगा . उस स्त्री के साथ मैं सुख पूर्वक रहूँगा. मुझे तरह तरह के छपन भोग खाने को मिलेंगे. अबतक मैं प्याऊ या अन्य धर्म स्थलों पर लोगों से पानी मांगकर पीते रहा हूँ. अब तो मेरी संताने होंगी मैं अपने बेटे से पानी मांग कर पिऊंगा . बेटा यदि पानी देने से मन करता है तो इसी लाठी से ऐसे ही घुमाकर एक लाठी मारूंगा.

भिक्षुक अपनी कल्पना में इतना खो गया था की अपने पास राखी लाठी को सच में कुटिया में घुमा मारा . इसतरह कुटिया में टंगी मटकियों के सारे अनाज आटा आदि बाहर बिखर गए..


रविवार, 11 जून 2017

जब घोड़ों के खिलाफ गधों ने जंग जीती

एक बार के राजा को अपने पडोसी शत्रु राजा के साथ युद्ध करना पड़ा।  युद्ध बहुत दिन तक चला और राजा के बहुत सारे सैनिक और हज़ारों घोड़े मारे गए। इस युद्ध में राजा अपने राज्य का एक महत्वपूर्ण भूभाग हार गया। राजा को अपने हारे हुए राज्य का हिस्सा वापस लेना था.  युद्ध क्षेत्र ऐसे स्थान पर था  जहाँ सिर्फ घुड़सवार  सैनिक से ही युद्ध जितना संभव था।  राजा ने  अपने मंत्री से इस विषय में मंत्रणा की।  राजा का मंत्री बहुत होशियार था। उसने राजा से कहा महाराज ! अपने प्रधान सेनानायकों के साथ एक बैठक की जाए।

बैठक में  निर्णय  लिया गया की अपने पास सैनिकों की कमी तो पूरा की जा सकती है लेकिन युद्ध के घोड़ों की कमी नहीं पूरी की जा सकती। इसके लिए हम अपने राज्य में सुलभ गदहों से काम चला लेंगे। जिन जिन धोबियों के पास गदहे हैं उन सभी धोबियों को निर्देश दिया जाए कि,  वो  राज दरबार में उपस्थित हो। राजा के कर्मचारी पुरे नगर में ढोल बजाकर इस बात की घोषणा कर दिए. राजाज्ञा का पालन करते हुए सभी धोबी राज दरबार में उपस्थित हुए। राजा के मंत्री ने सभी धोबियों को सम्बोधित करते हुए कहा। आप सभी के पशु हमारे घुड़सवार सैनिकों की सेवा में बहाल किये जाएंगे। इस राज संकट की स्थिति में आप के गधे ही हमारे लिए घोड़े हैं।  आप अपने पशुओं को अच्छी तरह खिलाईये और इन्हे दौड़ने का प्रशिक्षण दीजिये।

मंत्री के मुख से ऐसा सुनकर सभी धोबी बहुत हर्षित हुए और अपने अपने घर चले गए। सभी अपने अपने पशु पर विशेष ध्यान देने लगे। कईयों ने गधो के आहार दोगुना कर दिए. इसी क्रम में कई लोग अपने गधे के दौरने के साथ साथ यथासंभव युद्ध कला का प्रशिक्षण भी देने लगे। इस एक महीने के विशेष ध्यान पर सभी गधे मोटे तगड़े और पहले से  ज्यादा फुर्तीले हो गए। कई गधों की हरकत देखकर उनके गधा होने पर संदेह होने लगता।

इतिहास में पहली बार गधों का चयन प्रक्रिया से चयन हुआ.  सभी गधे राजा की घुड़सवार सैनिकों की सेवा में लगा दिए गए।
राजा ने शत्रु राजा के खिलाफ युद्धः की उद्घोषणा स्वरुप शंखनाद किया। विजय की मद में चूर शत्रु राजा ने राजा के सैन्य समर्थ का अवमूल्यन किया। परिणामस्वरूप राजा इस युद्ध में गधे सवार सैनिकों से घुड़सवार सैनिकों के खिलाफ युद्ध जीत गया.

अब सभी सेनानायकों ने मंत्री जी से गधों के युद्ध में योगदान की प्रसंसा की और इन्हे पुरस्कृत करने का सुझाव दिया। राजा का मंत्री बहुत बुद्धिमान था उसने सेनानायकों से कहा मैंने इन गधो को परिस्थिति विशेष के लिए घोड़े मान लिए थे। ये गधे पुरस्कृत जरूर किये जाएंगे लेकिन अगली संभावित लड़ाई हम घोड़ों से ही लड़ेंगे।

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