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बुधवार, 15 मार्च 2017

गोनू झा और भाना झा, भैंस का बँटवारा ।- bhains ka bantwaara

गोनू झा और भाना झा की कहानी

 गोनू झा और भाना झा दो भाई थे ।  गोनू झा बड़े भाई अपने छोटे भाई का ख़याल रखते थे । दोनो आपस में बड़े प्यार से रहते थे । बड़े हुए दोनो की शादी हो गयी । शादी के बाद दोनो भाइयों की पत्नियों ने संकीर्ण स्वार्थ दिखाना शुरू किया । धीरे धीरे भाइयों में दूराव बढ़ता गया ।
फ़िर पंचायत बुलायी जाने लगी । पंचायत की बैठक में गोनू झा के हितैषी सरपंच ने अपना फैसला सुनाया ।
सभी समान दोनो भाइयों में  बँट जाने के बाद एक कम्बल और भैंस के बंटवारे का विवाद नही सुलझ पा रहा था।

अंतत: कम्बल और भैंस का बँटवारा कूछ इस प्रकार हुआ । 

भैंस का बँटवारा ----
भैंस के आगे का हिस्सा भाना झा को और भैंस के पिछले शरीर का हिस्सा गोनू झा को ।
दिनभर भाना झा भैंस को चराते और रात को गोनू झा भैंस की दुध निकाल लेते । भैंस का गोबर भी इन्हीं के हिस्से था ।
कम्बल का बँटवारा --

कम्बल दिन में भाना झा के हिस्से था । रात में यह गोनू झा के सेवा में आ जाता । भाना झा इस बंटवारे से बहुत परेशान थे । दिन में भाना झा कम्बल को धोते सुखाते और रात में  यह गोनू झा  के हिस्से आता। गोनू झा रातभर कम्बल ओढ़कर चैन की नींद सोते। 

भाना झा इससे दुखी होकर अपने  मित्र से  मिलने  गये और अपनी सारी व्यथा उसे सुनाई। उनका मित्र बहुत समझदार  था।  उसने भाना  झा से सारी  बातें  सुनने के बाद  कुछ सुझाव दिए।

सुझाव  कुछ  प्रकार है। 


भाना झा  के मित्र  ने कहा कि , तुम्हारे हिस्से में भैंस का अगला हिस्सा है। इस हिस्से पर तुम कुछ कर भी हो।  जब गोनू झा भैंस का दूध  निकाल रहे हों तब तुम भैंस के मुंह पर लाठी से प्रहार करना। दिन भर कम्बल को गिला रखना। 

अब भाना  झा दिन में कम्बल को पानी में भिंगोये रखने लगे। भैंस के दूध निकालने  का समय होता तो भैंस के   मुंह पर लाठी से मारने लगते। 
गोनू झा अपने करतूत  पर पछताने लगे और भाना झा को भैंस के दूध में बराबर का हिस्सा दिया। बड़े भाई गोनू झा ने हमेशा के लिए कम्बल  भाना झा को दे दिया। 

मंगलवार, 14 मार्च 2017

खटमल और चीलर की कहानी

एक बार की बात है ।  राजा के पलंग में एक चीलर रहता था । चीलर बड़ी चालाकी से राजा के सो जाने के बाद राजा के रक्त का पान करता था ।

एक दिन राजमहल के सेवक के माध्यम से शयन कक्ष में खटमल आ गया । खटमल चुपके चुपके राजा के पलंग के पास जा पहुँचा । वहाँ छुपने का कोई उपयुक्त जगह ढूँढ़ने के क्रम में उसकी मुलाकात चीलर से हो गयी । चीलर ने अपने यहाँ आये अतिथि का यथोचित सत्कार किया ।  फिर दोनो अपने अपने जीवन यापन और जीवन शैली के बारे में एक दूसरे को बताने लगे । 

पहले खटमल ने चीलर से अपनी व्यथा सुनायी ।

खटमल  ने कहा -
- मित्र बहुत मुश्किल से राजा के क्रूर सेवकों के बीच जीवन गुजर रहा है । पेट भर रक्त भी नहीं मिल पाता और निशिदिन प्राण संकट बना रहता है ।  तुम्हारा तो यहाँ राजा के शयन कक्ष में बढिया से गुजर बसर हो रहा होगा ?

चीलर ने कहा --सुरक्षित जगह और मेरे सावधानी से दिन अच्छे कट जाते हैं । राजा के कोमल अंगों का शोणित पान करने का सौभग्य प्राप्त है मूझे । मैं राजा को गहरी नींद में सो जाने तक इंतजार करता हूँ ।


चीलर से यह सूनकर खटमल बहुत अधीर हो चला वह राजा का खून को चखने के लिय मचलने लगा । चीलर ने भरोसा दिलाया कि मैं आज़ रात को तुम्हे उपयुक्त समय पर राज शोणित चखने का मौका दूँगा ।रात हुई राजा अपने शयन कक्ष में आ गये ।  चीलर ने खटमल को समझाया कि , जल्दीबाजी मत करना पूरी तरह से नींद में आने पर ही नृप के समीप जाना । थोड़ी देर तो  खटमल मान गया , लेकिन उसकी अधीरता ने बाध्य कर दिया । राजा अभी पूरी तरह नींद में सोया न था तभी खटमल ने हमला कर दिया ।

राजा की वेदना स्वर सूनकर कई सेवक शयन कक्ष में आ गये ।  उन्होंने खटमल को ढूँढ निकाला और साथ में  चीलर भी पकड़ा गया । इस तरह एक दुष्ट मित्र की घृष्टता से मित्र की जान  चली गयी

सोमवार, 6 मार्च 2017

मातृभाषा के प्रति बढती उपेक्षा की भावना

Growing Sense of Neglect to the Native Language



मैं अपने घर पर माता, पिता, भ्राता और भार्या से भी अपनी मातृ भाषा भोजपुरी मे बात करता हूँ .
इसके विपरीत
यदि मेरे बच्चे मातृभाषा के प्रति उदासीन होकर हिंदी के शब्दों का प्रयोग करते हैं तो मुझे भी कोई आपत्ति नहीं थी. बच्चे बड़ी सहजता से भोजपुरी के शब्दों का हिंदी अनुवाद कर लेते हैं .
दहारण के लिए
अगर मैं अपने बच्चे से पूछूं
“बाबू का करतार”
उत्तर मिलेगा
“खा रहा हूँ पिता श्री “
मैं अपने गावं गया था तो पिता जी को यह बात रास नहीं आई .
मुझसे गावं के एक व्यक्ति मिलने आये . उन्होंने मुझसे भोजपुरी में बर्तालाप किया .
फिर घर की आँगन से खेलते हुए मेरा आत्मज निकला .
उस व्यक्ति ने बच्चे के तरफ इशारा करते हुए पूछा?
“इ राउर लईका हउवन”
मैंने कहा
“ह हमरे बेटा  हउवन”

फिर उस व्यक्ति ने बड़ी कठिनाई से शब्दों को सजोते हुए मेरे पुत्र से पूछा

“बाबू कहा रहत हो ?
बेटे का जबाब
“दिल्ली रहता हूँ .

.....
“मुझे दिल्ली लेई चलोगे”
“हाँ ले चलूँगा “

मेरे पिता जी वही बैठे थे सब देख रहे थे .
उस व्यक्ति के जाने के बाद उन्होंने मुझे समझाते हुए कहा ! लोग किस तरह अन्धानुकरण कर रहे हैं विवेक शून्य होकर ये देख रहे हो न ?
मैंने तात्पर्य नहीं समझा
पिताजी बोले !
“हिंदी बच्चों के लिए विशेष अपरिहार्य भाषा बन गयी . जैसे आपको मवेशियों से बात करने के लिए अलग भाषा(विशेष शब्द सांकेतिक भाषा)  का प्रयोग करना पड़ता है. ठीक उसी प्रकार ये आजकल के बच्चे भी अपनी मातृभाषा भोजपुरी नहीं समझ पा रहे हैं .”

इस quote  के बाद मैं उनके बिचार से सहमत हो गया . और अपने बच्चों को परस्पर पारिवारिक बोलचाल में हिंदी के प्रयोग पर प्रतिबन्ध की घोषणा कर दिया .

आप सभी मित्रों से निवेदन है की आप जिस पवित्र भूभाग से सम्बन्ध रखते हों आप उस क्षेत्रीय भाषा को उपेक्षा का शिकार मत होने दीजिये.    


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