धन वर्षा मंत्र - dhan varsha mantra

गुरुकुल में छात्रों को मनपसंद विषय चुनने की स्वतंत्रता थी. छात्र अपने रूचि के विषय में गुरुकुल में रहकर शिक्षा ग्रहण करते थे। एक छात्र था अर्थकाम वह धन की कामना रखता था और ऐसी विद्या के बारे में जानना चाहता था जिससे ज्यादा से ज्यादा कमाई हो सके। अपने साथियों से इस सम्बन्ध में बाते किया करता था। गुरु जी को भी इस बात की खबर हो गयी थी की अर्थकाम ज्यादा धन कमाने की इच्छा रखता है। एक दिन गुरु जी सभी छात्रों को सुख के लक्षण संबंधी अध्याय पढ़ा रहे थे। इस क्रम में गुरु जी ने एक श्लोक पढ़ा

अर्थागमो नित्यं आरोग्यता च प्रिया च भार्या प्रिय वादिनी च
वस्यश्च पुत्रोर्थकरी च विद्या  षड जीवलोकेषु सुखानी राजन


तात्पर्य
धन का नित्य आगमन हो , शरीर रोज स्वस्थ हो प्रिय स्त्री हो और प्रिय बोलने वाली हो , लड़का वश में हो धन कमाने वाली विद्या हो ये जीवलोक के छः सुख कहे जाते हैं।

अर्थकाम जब गुरु जी के मुख से श्लोक में पहला शब्द अर्थागम सुना तो उसे दृढ़ विश्वास हो गया की अर्थ धन ही सबसे बड़ा सुख है।

गुरु जी अर्थकाम की रूचि को देखकर उसे धनार्जन मन्त्र की शिक्षा देने लगे। धन वर्षा मंत्र बहुत ही लाभकारी मंत्र था इसकी सिद्धि और जप से आकाश से धन की वर्षा होती थी।  लेकिन यह आसमान के नक्षत्रों की विशेष संयोग से साल में केवल एक बार संभव था। अर्थकाम अपने गुरु की बताए मार्गदर्शन के अनुसार इस मंत्र की सिद्धि में लगा रहा। २ साल बाद उसे धनवर्षा मन्त्र की सिद्धि प्राप्त हो गयी। सभी छात्रों का दीक्षांत समारोह था। उस दिन संयोग से असमान में नक्षत्रों की वह विशेष स्थिति थी जिससे धनवर्षा  हो सकता था। अर्थकाम ने इसदिन धनवर्षा कराकर अपने गुरु जी को दक्षिणा दिया और अपने सभी साथियों को चौका दिया।


गुरु जी ने जाते जाते अर्थकाम को इस मंत्र से सम्बंधित विधि और निषेध बताये। गुरु जी ने अर्थकाम को ये भी बताया की बेटा धन साधन है इसे साध्य मत समझना। इसका उपयोग एक साधन के रूप ही ही करना। चार पुरुषार्थों में धर्म अर्थ काम मोक्ष में मोक्ष की साध्य है धन इसके निमित साधन है। गुरु जी की दी हुई सीख के साथ अर्थकाम अपने घर को लौट गया


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