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बुधवार, 28 दिसंबर 2016

पालतू कबूतर और धूर्त शिकारी - paltu kabutar aur dhurt shikari

एक शिकारी जंगल से कबूतर पकड़ कर लाता है। उसे अपने घर पर पिंजड़े में रखता है। कबूतर धीरे धीरे पालतू बनते जाता है। शिकारी कबूतर को काजू बादाम खिलता है। कबूतर मोटा तगड़ा हो जाता है। कबूतर शिकारी के यहाँ अपने को बहुत सुखी समझता है। कबूतर जंगल में अपने पुराने मित्रों और परिवार को भूल जाता है। कबूतर शिकारी को अपना सर्वस्व समझने लगता है।


एक दिन शिकारी कबूतर को जंगल में ले जाता है। शिकारी जाल बिछाता है और उस जाल के बगल में कबूतर को पिंजड़े सहित रख देता है। अब शिकारी पास के झाडी में जाकर छुप जाता है। शिकारी वहीँ से आवाज लगता है "बोलो बेटा"। कबूतर शिकारी की आवाज सुन जोर जोर से बोलने लगता है। कबूतर की आवाज सुनकर पास के पेड़ पर बैठे कबूतर सोंचते हैं ये कबूतर मुसीबत में है इसे बचने का प्रयास करना चाहिए। ये सोचकर कुछ कबूतर पेड़ पर से उतरकर पिजड़े में बंद पालतू कबूतर के पास आते हैं और वहां बिछाए गए जाल में फँस जाते हैं।
अब धूर्त शिकारी आता है एक एक कर सभी कबूतरों को पकड़ लेता है। शिकारी सभी कबूतरों को भर ले कर आता है। अब शिकारी पालतू कबूतर को पिंजड़े में तंग देता है। फिर इस पालतू कबूतर के सामने सभी कबूतरों को एक एक कर काटता है। पिंजड़े में बंद कबूतर इन कबूतरों को काटते देख कुछ नहीं करता है

आज हमारे देश में हिंदुओं का हाल भी कुछ ऐसे ही है। हिन्दू धर्म विरोधीं शिकारियों ने(नेताओं ने ) हिंदुओं में से बहुत से पालतू कबूतर पाल रखे हैं जो अपने सगे भाईओं को काटते देखते हैं और खामोस रहते हैं सिर्फ इसलिए की उनको उनके हिस्से का काजू बादाम मिल रहा है। यही हाल रहा तो कबूतरों("हिंदुओं") का अस्तित्व मिटना निश्चित है 

शनिवार, 24 दिसंबर 2016

आप दूसरे के बारे में भला सोचोंगे तो वो भी आपका भला सोचेंगे

Think Positive About Someone He Will Think Positive Too


विद्वानों  का मत है की अगर आप दूसरे के बारे में भला सोचोंगे तो वो भी आपका भला सोचेंगा। चन्दन का एक व्यापारी था। चन्दन के लकड़ियों का उसका  व्यवसाय बहुत अच्छा चल रहा था। उसने व्यापार के समृद्धि के लिए बहुत सी चन्दन लकड़ियां इकठ्ठा कर रखी  थी ताकि बाजार में बढ़ते मांग को पूरा किया जा सके। फिर बाजार में मंदी  आने से उसका व्यवसाय बिल्कुल  मंद पड़  गया। वह अपने व्यवसाय के प्रति चिंतित रहने लगा।
एक दिन राजा के यहाँ से उसका बुलावा आया। चन्दन का व्यवसायी राजा के दरबार में प्रस्तुत हुआ। व्यापारी अपने व्यवसाय से चिंतित था। राजा को देखकर उसने सोंचा ! अगर राजा की मृत्यु हो जाती है तो इनके अंतिम संस्कार के लिए मेरी चन्दन की लकड़िया बिक जाएंगी। राजा ने भी व्यापारी के तरफ ललचायी हुई नज़रों से देखा। राजा ने सोंचे इस धनी व्यापारी ने चन्दन की लकड़ियां बेचकर बहुत से पैसे कमाएं हैं। इसपर मैं यदि भारी कर लगता हूँ तो मुझे बहुत बड़ा राजस्व लाभ होगा। राजा ने व्यवसायी के प्रति ये भाव रखा और कुछ देर बातचीत के बाद उसे अतिथि विश्राम गृह में जाने को कहा। उसके पश्चात व्यवसायी अपने घर चला गया।

हमारे शरीर के अंदर जैसे भाव आते हैं हमारे आभामंडल उस अनुरूप हो जाते हैं। आभामंडल प्रत्येक व्यक्ति के शरीर के चारो तरफ एक सूक्ष्म घेरा होता है। ये आभामंडल हमारे सोच और विचार को भी प्रभावित करते हैं।
राजा भी शारीरिक संकट से जूझ रहे थे। राज पंडितों ने राजा की कुंडली देखकर कहा की महाराज आप को अच्छे स्वास्थ्य के लिए एक यज्ञ करना पड़ेगा। इस यज्ञ के लिए चन्दन की लकड़ियां और बाकी यज्ञ सामग्री तैयार करने की आज्ञा दें। यज्ञ लंबा चलना था और इसके लिए रोज चन्दन की लकड़ी चाहिए थी। 

राजा ने चन्दन की लकड़ी के लिए अपने सेवकों  को चन्दन के उसी व्यापारी के पास भेज दिया।  उन्होंने अपने सेवकों से चन्दन के व्यापारी को राजदरबार में उपस्थित होने के लिए बुला भेजा। राजा अभी अभी इस व्यापारी पर अधिक टैक्स लगाने वाले थे। लेकिन यज्ञ के लिए चन्दन की लकड़ी चाहिए थे अतः उन्होंने अपने इस फैसले को स्थगित कर दिया। राजा के सेवकों ने चंदन के व्यापारी को  राजा के यहाँ होने वाले यज्ञ के बारे में बताया। साथ ही यह भी बताया की यज्ञ लंबा चलेगा और राजा को यज्ञ के लिए महीनो शुद्ध चन्दन की लकड़ी चाहिए।

बनिए के अंदर राजा के प्रति भावना बदल गयी थी। पहले वो राजा की मृत्यु का अशुभ मना  रहा था ताकि राज  के अंतिम संस्कार के लिए उसकी चन्दन की लकड़िया बिक जाएँ। लेकिन अब वह राजा के दीर्घ जीवन की कामना करने लगा था जिससे उसकी चन्दन की लकड़िया और ज्यादा बिक सकें। इसी भाव से वह राजा के समक्ष प्रस्तुत हुआ। राजा के प्रति व्यापारी के अपने विचार बदलने से राजा भी व्यापारी के प्रति सही भाव रखने लगे थे। उन्होंने बनिए का बहुत बढ़िया आदर सत्कार किया तथा चन्दन के व्यापर पर अधिक कर लगाने की जो बात उन्होंने सोच राखी थी उसे अपने मन से निकाल दिया। राजा ने सोचा की वनिया धार्मिक कार्यों के लिए चन्दन की लकड़ी बेचता है। अगर यह अधिक कर से परेशान होगा तो हमारे राज्य में धार्मिक कार्य लोग रूचि लेकर नहीं करेंगे। धर्म में रूचि नहीं लेने से धर्म की हानि होगी, और हमारे राज्य में धर्म की हानि होने का मतलब है मेरी यानी राजा की हानि।

शनिवार, 17 दिसंबर 2016

टोपी विक्रेता और बंदर

एक टोपी विक्रेता था । वह गावँ शहर घूम घूम कर टोपी बेचा करता था । एक दिन वह अपने व्यापर के लिए एक गावँ में घूमकर खूब फेरी लगाया । सुबह से दोपहर हो गयी एक भी टोपी नहीं बिकी । दिन ढलने पर वह शहर की ओर जाने लगा । रास्ते में एक पेड़ की घनी छाव दिखी। उसने अपने साईकिल को पेड़ से लगाया तथा प्रचार के लिये जो टोपी पहन रखा था वही पहने सो गया ।


थके हुए टोपी विक्रेता को पेड़ की ठंढी छावं में शीघ्र ही नींद लग गयी । उस पेड़ पर कुछ बन्दर बैठे थे । बंदरों ने उस टोपी विक्रेता की तरफ बड़े गौर से देखा । फिर पेड़ पर से एक बन्दर उतरा और साईकिल की हैंडल पर रखी टोपी को उतारकर पहन लिया और पेड़ पर जा बैठा । अब उस बन्दर की देखा देखी एक एक कर सभी बन्दर उतरते और टोकरी में झलक रही टोपियों में से एक निकालते और पहन कर पेड़ पर बैठ जाते । इस तरह टोपी विक्रेता की टोकरी खाली पड़ गयी। पेड़ पर एक बन्दर बिना टोपी के रह गया था । वह बन्दर भी नीचे उतरा और फेरीवाले विक्रेता के सिर से टोपी उतार कर पहन लिया और पेड़ पर बैठ गया।

कुछ देर बाद फेरीवाला जब सर खुजलाते उठा तो उसे महसूस हुआ की उसके सर पर टोपी नहीं है। उसने साईकिल पर रखी अपनी टोपियों की तरफ देखा तो झोली खाली थी। वह अत्यंत चिंतित हुआ इधर उधर देखते हुए उसकी दृष्टि पेड़ पर बैठे बंदरों पर पड़ी विक्रेता स्तब्ध रह गया। वह लाचार था बंदरों से टोपी ले लेना किसी भी प्रकार से सम्भव नहीं था।

वह निराश होकर वहां से जाने की तैयारी करने लगा। तभी वहाँ से एक बुजुर्ग़ व्यक्ति गुजर रहे थे।  उन्होंने टोपी पहन रख थी। पेड़ पर टोपी पहने बैठे बंदरों को देख कर उन्हें हंसी आयी। वो उस टोपी विक्रेता के पास जाकर इसका रहस्य जानना चाहे। टोपी बेचने वाले ने उन्हें बताया की ये सभी बन्दर मेरे टोकरी से टोपी निकाल निकाल पहन लिए हैं जब मई सो रहा था। और तो और इन बंदरों ने मेरे सिर पर से भी टोपी उतार रखी है।

बुजुर्ग व्यक्ति समस्या को ठीक से समझ गए और उन्हें इसका समाधान भी सूझ गया। उन्होंने बंदरों के करीब जाकर अपने सिर से टोपी उतार कर फेंकने का नाटक किया। देखा देखी सभी बंदरों ने अपनी अपनी सर से टोपी उतार कर फ़ेंक दिया। अब टोपी बेंचने वाला बनिया एक एक टोपी इकठ्ठा किया और अपनी टोकरी में रख लिया। इस तरह उस बुजुर्ग व्यक्ति की चतुराई से टोपी विक्रेता की सारी टोपियां वापस मिल गयीं। 

बुधवार, 14 दिसंबर 2016

व्यवसाय के लिए धन मूल आवश्यकता नहीं - Funding is not a fundamental requirement for business

व्यवसाय के  लिए धन मूल आवश्यकता नहीं। किसी भी व्यवसाय के लिए धन की आवश्यकता  होती है लेकिन धन से भी जरुरी है  व्यवसायिक बुद्धि। 

दो व्यवसायी आपस में बात कर रहे थे। पहले व्यवसायी का व्यापर सही चल रहा था दूसरे के पास काफी आर्थिक तंगी थी वाणिज्य में घाटे से उसके पास नए व्यवसाय के लिए पैसे नहीं थे। वह अपने मित्र से यही दुःख बार बार रो रहा था। पहला व्यापारी जो धनि था उसे व्यवसाय का अनुभव था। वह अपने मित्र से बार बार यही कहता वाणिज्य के लिए धन का होना कोई जरूरी नहीं उसके लिए तो व्यावसायिक बुद्धि ही पर्याप्त है।
निर्धनता से दुखी दूसरे मित्र को ये बात काफी अटपटी लगी वह झुंझला कर बोला। मित्र तुम कैसी अटपटी बात कर रहे हो भला बिना पैसे के रोजगार कैसे हो सकता है क्यों मेरे निर्धनता का उपहास  कर रहे हो। पहले मित्र ने उसे समझते हुए कहा मैं सच कह रहा हूँ। ये जो तुम्हारे बगल में चूहा मरा पड़ा  है न तुम इससे भी व्यवसाय कर सकते हो। 


दूसरे मित्र ने वह मृत चूहा उठाया और साप्ताहिक बाजार की ओर दोनों चल पड़े। बाजार में एक बनिया पालतू जानवर कुत्ते बिल्ली बेचता था। उसके जानवरो को खाने के लिए कुछ नहीं मिल रहा था। उसने दूसरे बनिए के हाथ में चूहा देखा तो अपने बिल्ली के लिए खरीद लिए। 

इस प्रकार मृत चूहे से मिले पैसे से बनिए ने चना खरीद कर बेचना शुरू किया। थोड़ा सा चना बेचने से जो मुनाफा हुआ उससे वह फिर और ज्यादा चना ख़रीदकर बेचना शुरू किया। इस तरह उसका मुनाफा बढ़ता गया और वो अपना व्यवसाय भी बढ़ता गया।

इस तरह एक मृत चूहे के मुनाफे से वह एक धनी  व्यवसायी बन गया।

गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

किसी को सही से समझने के लिए लंबा समय देना पड़ता है

एक बुद्धिमान बनिया के चार पुत्र थे। वह अपने पुत्रों को शिक्षा दे रहा था। बनिए ने अपने पुत्रों को एक दिन समझते हुए कहा की किसी भी चीज़ के बारे में हमें सही जानकारी लेने के लिए उसे लंबे समय तक देखना पड़ता है। तभी हम उसके प्रकृति और स्वभाव  के बारे में सही जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

वणिक पुत्रों को पिता के बात पर विश्वास नहीं हुआ। एक पुत्र ने कहा की पिताजी किसी बस्तु को हम देख के कुछ छड़ों में ही इसके बारे में बता सकते है इसमें इतन समय व्यर्थ करने की क्या जरुरत है। उसके बात से बाकी दोनों भाइयों ने सहमति दिखाई। उन तीनो लड़कों ने एक साथ कहा पिता जी हम अपने दूकान में रखी बस्तु को तो शीघ्र ही पहचान जाते हैं फिर आप ऐसा क्यों बोल रहे हैं।

फिर उस वणिक ने चार चार महीने के अंतराल पर अपने सभी पुत्रों को संतरे के पेड़ खोजने के लिए भेजा। उसने कहा की अपने बाग़ में संतरे का पेड़ नहीं है हम चाहते हैं की अपने बाग़ में भी संतरे के पेड़ हो

पिता की आज्ञा पाकर पहला पुत्र पेड़ की तलाश में चल पड़ा। लोगो से पूछते हुए वह संतरे के पेड़ के पास पहुँचा। उसने संतरे के पेड़ को देखा वह टेढ़ा मेढा  और सुख हुआ था। सूखे पेड़ को देखकर वह उसे छोड़ कर चला गया उसने ऐसे पेड़ के पौधे ले जाने उचित नहीं समझा।

कुछ दिन बाद यानि चार महीने के अंतराल पर सेठ ने अपने दूसरे पुत्र को संतरे के पेड़ ढूढने और उसके पौधे लाने के लिए कहा। ढूढते ढूढते वह एक फलों के पौधों के नर्सरी में पहुँचा। पेड़ तो हरे भरे थे लेकिन उसमे फल नहीं लगा हुआ था अन्यमनस्क होकर वह उस पेड़ के पौधे अपने बगीचे में लगाने के लिए ले लिया।

अब ४ महीने बाद तीसरे पुत्र को पौधे के तलाश में भेजा गया। पौधे के तलाश में जब वह संतरे के पेड़ के पास पहुंच तो वहां जाकर उसने सुन्दर फलों से लदे संतरे के पेड़ को देखा। पेड़ देखकर बहुत खुस हुआ और उसका पौधा अपने साथ ले लिए

अब बनिए ने अपने सभी पुत्रों को बुलाया
पहला पुत्र पिताजी संतरे का पेड़  तो बिलकुल टेढ़ा मेढा और सुख था इसलिए मैंने उसके पौधे भी साथ नहीं लाया
दूसरे पुत्र ने उसे रोकते हुए कहा नहीं नहीं वो तो बिलकुल हरा भरा था लेकिन उसपर फल नहीं थे फिर भी आपकी आज्ञा से मैं वह पौधा ले कर आया हूँ

तीसरे पुत्र ने दूसरे के बात को काटते  कहा नहीं भैया उसपर फल भी लगे थे मैं सुन्दर फल भी लाया हूँ और पेड़ लगाने के लिए पौधे भी। तीसरे लड़के ने फल और पौधे दिखाते हुए ये बात कहा  .,

बनिये ने अपने पुत्रों से पूछा ? तीनो ने उत्तर दिया तीनो को सार समझ में आ गया था।

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