प्रतिक्रिया जीवन की कसौटी - प्रतिक्रिया में व्यक्तिगत भिन्नता

प्रतिक्रिया जीवन की कसौटी
प्रतिक्रिया जीवन की कसौटी है। एक ही बात का विभिन्न व्यक्तियों पर पात्रता के आधार पर भिन्न प्रतिक्रिया होती है। इस कहानी में तीन पात्र हैं जिनपे एक ही बात का अलग अलग असर हुआ है।

पुराने समय में राजा बलदेव  राय  राजा राज करते थे। वो बहुत ज्ञानी , न्याय प्रिय और समाज शास्त्री भी थे। व्यक्ति  के स्वभाव को वो देख कर ही पहचान लेते थे। उनके नयन करने की प्रक्रिया बहुत निराली थी। एक बार राजा के दरबार में चार चोर पकड़ कर लाये गए। चारों  का अपराध था चोरी। अलग अलग जगहों पर चारो व्यक्तियों पर चोरी का आरोप था। राजा के सिपाही इन अभियुक्तों  को दरबार में पेश  किया थे। अपराध सिद्ध होने पर इनको सजा मिलनी थी या आरोप झूठ साबित होने पर ये चारो मुक्त हो सकते थे।


राजा के समक्ष जब एक एक कर इन चारों अभियुक्तों को पेश किया गया तो राजा ने इन सभी को अलग सजा सुनाया जबकि अपराध सबका सामान था। यह देख कर सभी दरबारी चकित थे।

१) पहले अभियुक्त को राजा ने सजा सुनाई ने के क्रम में सिर्फ इतना कहा , तुम्हे ऐसा नहीं करना चाहिए " वह अभियुक्त चला गया

२) दूसरे अभियुक्त को राजा के समकक्ष पेश किया गया -
राजा ने उस अभियुक्त को ऊपर से नीचे  तक देखा और सिपाहियों से कहा की इसे ले जाओ अपमानित मर के छोड़ दो। राजा के सैनिक उसे अपशब्द कहकर  छोड़ दिए।
३) अभियुक्त को राजा ने चार कोड़े मारकर  छोड़ देने को कहा। चार कोड़े खाकर तीसरा अभियुक्त चला गया।
४) अब राजा के समक्ष चौथा अभियुक्त पेश हुआ। राजा बलदेव राय  ने कुछ देर तक चोर की तरफ देखा और उसे सजा सुनाया। इस चोर को सजा सुनाया गया कि "इसका मुंडन कर गधे पे बिठा कर सारे नगर में घुमाव" नगर के बच्चे इसपर कूड़ा और गन्दगी फेंके और ताली बजाएं।

राजा ने सजा सुनाने के बाद चारो अभियुक्तो के पीछे एक एक गुप्तचर लगा दिया। जो सजा के बाद इनपर हुई प्रतिक्रिया के बारे में राजा को खबर देंगे।

पहले अभियुक्त का गुप्तचर राजा के समक्ष आया और राजा से अनुमति प्राप्त कर बोला। राजन आपने जिस चोर को "तुम्हे ऐसा नहीं करना चाहिए " कहा था। वह वास्तव में चोर नहीं था उसपर चोरी का झूठा इल्जाम लगा था। वह आपके इस वाक्य से इतना आहत का की घर जाकर जहर कहकर आत्महत्या कर लिया।

 थोड़ी देर बाद दूसरे अभियुक्त का गुप्तचर आया। उसने दूसरे अभियुक्त के बारे में बताया। महाराज आपने जिस अभियुक्त  को अपमानित करके भेज दिया तथा वो भी चोर नहीं था चोर चोरी का धन इसके कुटिया के पास रखकर भाग गए थे, और ये निर्दोष  पकड़ा गया था। जब आपने उसे अपमानित करके भेजा  तो वह इतना लज्जित हुआ की लज्जा के मारे ये शहर ही छोड़ गया।

दूसरे दिन राज दरबार में तीसरे अभियुक्त का गुप्तचर आया।  गुप्तचर ने बताया महाराज आपने जिस चोर को ४ कोड़े मारकर छोड़ दिया था वो भी चोर था लेकिन उसके चोरी के अपराध भी छोटे थे। उसने अपने परिवार के भरण पोषण के लिए सेठ के बाग़ से फल चुराए थे। आपके सजा की उसपर सकारात्मक प्रतिक्रिया हुई है। अब ये प्रायश्चित के तौर पर उसी सेठ के यहाँ फलों की रखवाली कर रहा है और खुश है।

तभी चौथा गुप्तचर आया जो सज़ा के बाद चौथे चोर के गतिविधियों पर नजर रख रहा था। गुप्तचर ने कहा  महाराज जिस दिन उसको नगर में गधे पे बैठा कर घुमाया जा रहा था तब से मैं इसपर नजर रखा हूँ।
उसके  शरीर पर बच्चे मिटटी गोबर फ़ेंक रहे थे।  अपने घर से गुजरते हुए रस्ते में उसे  अपनी पत्नी दिख गयी। पत्नी को जोर से आवाज लगते हुए कहा घर पर पानी तैयार रखना अभी इन बच्चों को नगर घुमा के आ रहा हूँ।

राजा ने अपने दरबारियों से कहा इन चार अभियुक्तों पर होने वाली प्रतिक्रिया अलग अलग इसलिए हुई क्योंकि मेरे द्वारा दी गयी सजा को सबने अलग अलग तरीके से समझने की कोशिश  की।

किसी आदमी के स्वभाव को बदलने के लिए सजा का सख्त होना उतना जरूरी नहीं जितना की प्रतिक्रिया का असरदायी होना है। मैंने पहले अभियुक्त को सिर्फ इतना कहा की ये काम तुम्हारे लायक नहीं तो वह आत्महत्या कर लिया जबकि मुंडन कराकर गधे पर घुमाने वाले पर सजा को उतना असर नहीं हुआ यानि चोरी करना नहीं छोड़ा
एक ही अपराध में अभियुक्त थे चारो अपराधी, लेकिन चारों  पर प्रतिक्रिया भिन्न भिन्न हुई। अतः कहा गया है की प्रतिक्रिया जीवन की कसौटी है। जब तक आपपर किसी बात की प्रतिक्रिया नहीं होती।

इस कहानी में असली चोर कौन था

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