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बुधवार, 28 सितंबर 2016

पुनर्मूषिको भव- Phir se Chuha ho Jawo

पुनर्मूषिको भव

पुनर्मूषिको भव ->यह कथा बहुत महत्वपूर्ण और शिक्षाप्रद है। यह कहानी एक कृतघ्न चूहे के प्रति है जो ऋषि के आशीर्वाद से बाघ बन गया और फिर ऋषि पर आक्रमण करने से ऋषि ने शाप देकर उसे फिर चूहा बना दिया।  इस कहानी से हमें कृतज्ञता की शिक्षा मिलती है।

एक बार जंगल में आश्रम बनाकर एक ऋषि रहते थे।  ऋषि की कुटिया के आस पास काफी पवित्र वातावरण था। ऋषि के प्रभाव से सारे जीव वहां  निर्भय होकर रहते थे। एक दिन ऋषि पूजा के आसान पर बैठे थे तभी एक चूहा उनकी गोद में आकर गिर पड़ा। चूहा भयभीत था उसे किसी बिल्ली ने मारकर खाने के लिए पीछा किया था।

ऋषि ने चूहा  को दुखी देखा तो सोचा अगर इसी बिल्ली से भय है तो ये भी बिल्ली हो जाए। ऋषि ने उस चूहे को भी बिल्ली बना दिया। अब उस बिल्ली बने चूहे को बिल्ली से भय नहीं रही. आश्रम के इर्द गिर्द सुखपूर्वक विचरण करता  .

एक दिन किसी कुत्ते ने उस बिल्ली का पीछा किया।  बिल्ली भागते भागते ऋषि के शरण में आयी। ऋषि ने उससे परेशानी का कारण पूछा।  बिल्ली ने कहा की  कुत्ते मुझे डराते हैं।

ऋषि ने कहा "स्वानः त्वाम विभेति! त्वमपि स्वानोभाव " अर्थात कुत्ता तुम्हे डरा रहा है तुम भी कुत्ता हो जाओ। ऋषि के आशीर्वाद से बिल्ली बना चूहा अब कुत्ता हो गया। अब उसे कुत्ते बिल्लियों से कोई डर नहीं रहा।
एक दिन कुत्ते पर ब्याघ्र (बाघ ) की नजर पड़ी. बाघ ने कुत्ते को खाने के लिए उसका पीछा किया। बाघ की दर से कुत्ता भाग कर ऋषि की शरण में जा पहुँचा।
ऋषि ने कुत्ते को बाघ की दर से भयभीत देखा ->
ऋषि बोले "ब्याघ्रह त्वम् विभेति! त्वमपि ब्याघ्रों भव"
अर्थात बाघ तुम्हे डरातें हैं तुम भी बाघ हो जाओ। अब ऋषि के आशीर्वाद से वह बाघ बन गया।
ऋषि के आशीर्वाद से बने बाघ को अब किसी जानवर से डर नहीं था। वह जंगल में निर्भय हो घूमता था।
जंगल के दूसरे जानवर उसके बारे में बाते करते की ये बाघ पहले चूहा था। ऋषि ने इसे आशीर्वाद /वरदान देकर बाघ बना दिया  है। बाघ को अपने बारे में दूसरे जानवरों से ऐसा सुनकर बहुत बुरा लगता। जब भी कोई उसे कहता की ये तो पहले चूहा था ऋषि के वरदान से बाघ बना है।  तो बात बहुत लज्जित हो जाता।


बाघ अपने सारी परेशानी का जड़ ऋषि को मानाने लगा। बाघ ने समझा की जबतक ये  ऋषि जीवित है लोग मेरे बारे में ऐसे ही बोलते रहेंगे। इस ऋषि को खत्म कर देना चाहिए। ऐसा विचार कर वह कृतघ्न बाघ ऋषि पर आक्रमण कर दिया। ऋषि ने बाघ की कुटिलता को पहचान लिया। ऋषि ने कहा- "कृतघ्नोसि पुनर्मूषिको भव" अर्थात कृतघ्न हो फिर से चूहा हो जाओ-
इसतरह कृतघ्न बाघ ऋषि के शाप से फिर से चूहा बन गया। अतः हमें किसी के पार्टी कृतज्ञ होना चाहिए।

कृतज्ञ -जो किसी के किये गए उपकार को मानता हो ।

कृतघ्न -जो किसी के किये गए उपकार को नहीं मानता हो।


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गुरुवार, 22 सितंबर 2016

राजा भोज और लकड़हारा

 राजा भोज भारत  के ऐसे प्रसिद्ध राजा हुए।  जिनका नाम हर किसी के जिह्वाग्र पर रहता है। लोग बात बात पर राजा भोज की उपमा दिया करते हैं। एक लोकोक्ति "कहा राजा भोज कहाँ गंगा तेली " तो इतना लोकप्रिय है कि  अक्सर लोग इसका प्रयोग करते देखे जाते हैं।
राजा भोज धार नगरी के राजा थे।  उनके राज्य में कला साहित्य और संगीत को बहुत प्रश्रय मिला। विद्वानों का आदर करना और उनको सम्मानित करना राजा भोज को बहुत अच्छा लगता था। उनके राज्य में संस्कृत भाषा का बहुत उत्कर्ष हुआ। आम नागरिक भी शुद्ध संस्कृत बोलता था।

एक बार राजा भोज भ्रमण करने निकले थे।  रास्ते में उन्हें एक लकड़ी का भोज सिर  पर रख कर लाते हुए एक <a href="http://storiesformoralvalues.blogspot.in/2016/06/honesty-the-best-policy.html?m=1">लकड़हारा</a> दिखाई दिया। लकड़ी का भोज ज्यादा देख कर राजा भोज ने लकड़हारे से पूछा।  "भारो  वाधति"? अर्थात लकड़ी का भार ज्यादा कष्ट तो नहीं पहुँचा  रहा ?


लकड़हारे ने जबाव दिया
"भारो न वाधते  राजन यथा वाधते  वाधति" अर्थात हे राजन सिर पर लकड़ी के भार  से मुझे इतना कष्ट नहीं हो रहा जितना आपके मुख से वाधते को वाधति सुन कर हुआ है।

राजा भोज संस्कृत के अच्छे ज्ञाता  थे।  उनसे ऐसी छोटी गलती होना तो सम्भव नहीं। वास्तव में राजा भोज अपने राज्य के आम नागरिकों में संस्कृत भाषा के प्रति रूचि देखना चाहते थे।  इसलिए उन्होंने जान बूझकर वाधते शब्द को वाधति  बोला था।

अपने राज्य के लकड़हारे के मुख से संस्कृत के शुद्ध शब्द धातु प्रयोग सुनकर  राजा को बहुत हर्ष हुआ इन्होंने उसे पुरष्कृत किया।

संस्कृत भाषा में कुछ क्रियाओं के धातु आत्मने पद के होते हैं तो कुछ क्रिया के धातु परस्मै पद के। कुछ धातु उभय पड़ी भी होते है।  अर्थात आत्मने पद और परस्मै पद दोनों प्रयुक्त होता है। यहाँ इस चर्चित संस्कृत वाक्य में आत्मने पद वाधते ही  मान्य है।   

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मंगलवार, 20 सितंबर 2016

ब्राम्हण सुनार और महाकवि कालिदास

Brahman Sunar aur Mahakavi Kaali Daas 

राजा भोज बड़े न्यायप्रिय थे । उनके राज मे कठिन व जटिल आपराधिक  विवादों का सही न्याय होता था ।
आपराधी चाहे जितनी चालकी से अपराध कर साक्ष्य मिटाना चाहे राजा भोज के न्याय प्रक्रिया से बचना  मुश्किल था ।
उनके राज्य के दो ग्रामीण  धन अर्जन करने विदेश यात्रा  पर गये । उन दोनो मे से एक ब्राम्हण था तथा दुसरा सुनार(स्वर्णकार ) था । दोनों  विदेश  मे परिश्रम कर  के धन कमाये । ब्राम्हण की पंडिताई खुब चली और वह खुब पैसा  कमाया ।सुनार के सोने चाँदी का व्यवसाय भी खुब चला । लेकिन ब्राम्हण की कमाई सुनार  की कमाई से कई गुना  ज्यादा  थी । सुनार को ब्राम्हण की कमाई देख के  जलन होते रहती थी।  लेकिन धूर्त सुनार अपने ईर्ष्या को ब्राम्हण के सामने प्रकट नहीं होने देता था।
बहुत दिनों बाद दोनों ने  अपने गावँ जाने का निश्चय किया दोनों साथ ही चल पड़े। रास्ते में जंगल का रास्ता पड़ता था।  पुराने ज़माने में मार्ग की यात्रा  बहुत कठिन होती थी।  रास्ता कई विहड़ जंगलों से होकर गुजरता था। मार्ग में हिंसक जानवरों से सुरक्षा के लिए यात्री अपने साथ अस्त्र शस्त्र लेकर चलते थे। मार्ग में हिंसक जानवरों से सुरक्षा के लिए सुनार ने एक तलवार ले लिए और दोनों अपने गावँ को निकल पड़े।
ब्राम्हण और सुनार दोनों अपने साथ कुछ स्वर्ण मुद्राये लेकर जा रहे थे।  अतः दोनों मार्ग में सम्भव किसी भी अप्रिय घटना से सावधान होकर जा रहे थे। ब्राम्हण के पास सुनार से ज्यादा धन था।  ब्राम्हण को पोटली सुनार की पोटली से भारी थी। सुनार को ब्राम्हण के धन पर लालच आ गया। वह ब्राम्हण की हत्या कर सारा धन ले लेना चाहता था। मौका पाकर उसने ब्राम्हण पर हमला बोल दिया।

ब्राम्हण ने सावधान होकर सुनार से विनती किया।  तुम मुझे मार दो लेकिन ये मंत्र मेरे घर पर पहुंच देना।
ब्राम्हण ने एक पत्र पर चार अक्षर "अ प्र शि ख" लिख कर दे दिए। सुनार ने उस सन्देश को अपने लिए कोई परेशानी नहीं समझ कर अपने पास ले लिए। ब्राम्हण की हत्या कर वह अपने घर समूचे धन के साथ पहुँच गया। ब्राह्मण के  घर घड़ियाली आंसू बहते हुए गया और ब्राम्हण का लिखा हुआ पत्र दे आया। ब्राम्हण पत्नी से सुनार ने कहा की मार्ग में हम दोनों साथ लौट रहे थे।  पंडित जी को बाघ मारकर खा गया।  किसी तरह मैं अपनी जान बचाने में सफल रहा।
ब्राम्हण परिवार बहुत शोकाकुल था। उस चिट्टी पर लिखे गए चार अक्षर का अर्थ  किसी को समझ में नहीं  आ रहा था। शोकाकुल ब्राम्हण पत्नी ने राजा भोज के दरबार में गुहार लगायी। राजा भोज ने अपने सभी विद्वानों से इस चार अक्षर के रहस्य को सुलझाने के कहा। लेकिन किसी विद्वान ने कोई सार्थक अर्थ नहीं निकाले इन चार अक्षरों के।
अंत में महाकवि कालिदास को यह समस्या सुलझाने को कहा गया। कालिदास तो आंसू कवि थे ही उन्होंने  तुरंत एक काव्य रचना कर दी। जो काव्य रचना हुई उससे बहुत बड़ा आपराधिक रहस्य का उद्घाटन हुआ।
अ से ->अनेन स्वर्णकारेण
प्र  से ->प्रदेशे निर्जने वन
शि से ->शिखामादाय हस्तेन
 ख से ->खड्गेन निहतः शिर: यात्रा पर 

अनेन   स्वर्णकारेण,  प्रदेशे  निर्जने  वन।
शिखामादाय हस्तेन, खड्गेन निहतः शिर: ।।
अर्थात इसी सुनार ने प्रदेश के निर्जन वन में ब्राम्हण के शिखा को हाथ से पकड़ कर खड्ग से शिर काट दिया।


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सोमवार, 19 सितंबर 2016

राजा भोज और महाकवि कालिदास

राजा भोज विद्वानो और साहित्यकारों को बहुत आदर करते थे । उनके राज्य मे कला, साहित्य और  संस्कृति का बहुत संवर्धन हुआ । उनके  राज्य मे आम नागरिक  भी  संस्कृत  बोलता था । राजा भोज और लकड़हारा के संस्कृत संवाद बहुत मशहूर है ।

राजा भोज के   दरबार मे महान कवि कलीदास रहते थे । कालिदास आशुकवि थे । आशुकवि यानि जो तुरंत कविता  बनादे । राजा भोज के नवरत्नो मे कालिदास को शीर्ष  स्थान प्राप्त था ।
राजा भोज कवियों को कविता  सुनाने पर पुरस्कृत करते थे ।

कवि काव्य रचना करते और  दरबार मे अपनी कविता  सुनाकर पुरस्कार  पाते ।
एकबार कालिदास भ्रमण  करने निकले थे ।उनहोने एक कवि को सरोवर  किनारे  जामुन के पेड़ के नीचे काव्य रचना करते देखा । कवि महोदय कविता  पुरी नही होने से परेशान थे ।
कालिदास ने उनसे उनकी व्यथा जाननी चाही ।
कवि ने कालिदासको अपनी व्यथा सुना दी
सरोवर के जल मे जामुन  का फल गिरा था ।मछलियाँ फल के पास आती थीं लेकिन उसे खाती नही थी । कवि इसी को कविता  का रुप देना चाहते थे । इस कविता  को राज दरबार  मे सुनाकर ईनाम पाना  चाहते थे । लेकिन उनकि कविता  पुरी नही हो पा रही थी ।
उनकी कविता  इसप्रकार थी ।
जम्बु फलानि पक्वानि पतन्ति निर्मले जले तानि मत्स्यानि न खादन्ति । ।-----------------------------------------------------------
कविता के दुसरे पंक्ति  की तुकबंदी  नहीं  हो पा रही थी ।
कालिदास तो आशुकवि थे ही उन्होनें कविता को पुरा कर  दिया । वह कविता  इस प्रकार थी ।
जम्बु फलानि पक्वानि पतन्ति निर्मले जले |
तानि मत्स्यानि न  खादन्ति   जाल   गोटक    शंकया ||
अर्थात्
जामुन के फल पके है  स्वच्छ जल मे गिरे हैं।लेकिन  जाल  के गोटे के आशंका से मछलियाँ  इसे नही खा रही हैं ।
कालिदास की प्रसिद्धि देखकर दुसरे कवियों को जलन होने लगी । एकबार शतंजय कवि ने उन्हें  नीचा दिखाने के लिए कविता की रचना की और राजा भोज  के सामने कवि सभा मे ओ कविता  सुनाया ।
अपशब्दं शतं माघे भैरवी च शतत्रयं
कालीदासे न गणयन्ते कविरेको शतंजयः
अर्थात्
माघ कवि की रचना मे १०० गलतीयाँ हैं, भैरवी की कविताओं मे ३०० गलतियाँ हैं तथा कालीदास की काव्य रचना मे अनगिनत गलतियाँ हैं
कालिदास ने इस कविता के एक शब्द मे छोटी सी मात्रा जोड़कर कविता के अर्थ को बदल दिया
कालीदास द्वारा कविता
अापशब्दं शतं माघे भैरवी च शतत्रयं
कालीदासे न गणयन्ते कविरेको शतंजयः
अर्थात्
माघ कवि जल  के १०० पर्यायवाची शब्द  जानते हैं, भैरवी ३०० और कालीदास अनगिनत  पर्यायवाची शब्द जानते हैं। दुर्भाग्यवश शतंजय कवि जल का एक  ही पर्यायवाची शब्द  जानते हैं ।

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शनिवार, 17 सितंबर 2016

जीवन में चुनौतियां हमें सजग रखती हैं

The Challenges in Life To Keep Us On Our Toes

जापानियों को हमेशा ताज़ी मछलियां पसंद है। लेकिन जापान के तटीय समुद्र में दशकों से ताज़ी मछलियां नहीं मिल रहीं थी। अतः जापान निवासियों को मछली खिलाने के लिए मछली पकड़ने की बड़ी बड़ी नौकाओं को पहले से कहीं ज्यादा दूर समुद्र में मछली पकड़ने जाना पड़ता था। मछुवारे समुद्र में जितनी दूर जाते थे, उन्हें मछली के साथ वापस लौटने में उतना ही समय लगता था। अगर वापसी का समय ज्यादा दिन का होता तो मछलियां फ्रेश नहीं रह जाती। जापानी लोगों को इन मछलियों का स्वाद अच्छा नहीं लगता था।
 इस समस्या का समाधान करने के लिए मछली पकड़ने वाली कंपनियों ने नाव पर फ्रीजर लगा दिए।
वे अब मछलियां पकड़ते और मछलियों को फ्रीज़ में रख लेते। नाव पर फ्रीज़ लग जाने से वे अब समुद्र में और दूर जाकर मछली पकड़ने में सक्षम हो गए। अब उन्हें फ्रीज़ में मछलियों को ख़राब होने का दर नहीं था। लेकिन जापानियों को ताज़ी मछलियों में और फ्रीज़ की मछलियों के स्वाद में फर्क महसूस हुआ और वे फ्रीज़ की मछलियों को नापसंद करने लगे।


 फ्रीज़ में जमी हुई मछलियों ने कीमत में कमी ला दिया। अतः मछली पकड़ने वाली कंपनियों ने नाव पर मछली टैंक स्थापित कर दिए। वे मछलियों को पकड़ते और नाव पर राखी पानी की टैंक में रख देते।
थोड़ी देर छटपटाने के बाद मछलियां टैंक में चलना फिरना बंद कर देते और अधमरा सा टैंक के पानी में किसी किनारे पड़ी रहती। वे थक जाती और सुस्त हो जाती, लेकिन जिंदा रहतीं। दुर्भाग्य से, जापानी फिर भी स्वाद में अंतर महसूस किये। क्योंकि मछलियां कई दिनों से चली नहीं थी, जिससे वे अपने ताजा मछली का स्वाद खो दी। जापानियों को ताजा मछली का जीवंत स्वाद पसंद था ,  उनलोगों ने सुस्त मछली पसंद नहीं किया।

तो कैसे जापानी मछली पकड़ने वाली कंपनियों ने  इस समस्या का हल किया? कैसे वे जापान के लोगों के लिए स्वाद की मछली उपलब्ध करा पाए ? आप मछली उद्योग के सलाहकार रहे होते, तो आप क्या सिफारिश करते ?

कुछ देर सोचिये !
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कैसे जापानी मछली देर तक ताजा रही ?

मछली का स्वाद ताजा रखने के लिए, जापानी मछली पकड़ने वाली कंपनी अभी भी टैंक में मछली डाला करती थीं। लेकिन अब वे एक टैंक में एक छोटी सी  शार्क डाल दिया करती थी। शार्क कुछ मछली खा जातीं, लेकिन अब मछली बहुत ही जीवंत अवस्था में पहुंचने लगी। मछलियों को अब शार्क मछली से चुनौती का सामना कर जीवन रक्षा के लिए भाग दौड़ करना पड़ता था।


क्या आपने महसूस किया है ? हम में से कुछ लोग ऐसे ही एक तालाब में रह रहे हैं। अधिकांश समय थके हुए हैं और सुस्त महसूस कर रहे हैं। इसलिए हमें जागते और बढ़ाते रखने के लिए हमारे जीवन में भी एक शार्क की जरूरत है। असल में हमारे जीवन में शार्क नई चुनौतियां हैं जो हमें सक्रिय और जीवंत रखने के लिए सक्षम हैं।

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शुक्रवार, 16 सितंबर 2016

सबसे बड़ा झूठ, प्रतियोगिता

सबसे बड़ा झुठा कौन . _?एक बार एक राजा के मन मे जिज्ञासा हुई यह जानने की कि उसके राज्य मे सबसे बड़ा झुठ कौन बोलता है ? इसके लिए उसने पुरे राज्य मे ढोल बजा कर फरमान जारी करा दिए। पुरे राज्य मे राजा के कर्मचारी ये संदेश फैला दिए। जो सबसे बड़ा झूठ बोलेगा राजा द्वारा सम्मानित किया जायेगा। इस प्रतियोगिता के लिए एक दीन निश्चित हुआ । राजा के राज्य से दुर दुर के लोग इस प्रतियोगिता मे भाग लेने तथा प्रतियोगिता देखने आए ।


१ झुठा व्यक्ति --- मेरे दादा जी के पास एक खाट थी जिसपर मुहल्ला के सारे लोग सो जाते थे । राज दरबारीयों ने कहा अगर खाट बहुत बड़ी हो तो उसपर इतने लोग आराम से सो सकते हैं। ये कोई झुठ नही हुआ ।
२ झुठा व्यक्ति ---मैने दो औरतों को चुपचाप बैठे हुए देखा। जैसा कि सभी जानते है दो औरत एक दुसरे से बिना बात किए नहीं रह सकती। यह बात सबको झुठ प्रतीत होने लगी। लेकिन दरबारियो ने सोचा कि अगर यह जीत गया तो पुरस्कार की राशी १ हजार स्वर्ण मुद्राए इसे देनी पड़ेगी और राज कोष खाली हो जाएगा । दरबारी चाहते थे कि कोई प्रतियोगी पुरस्कार नहीं जीच पाए ।
दरबारीयों ने फैसला सुनाया -- अगर दोनों महिलाओं में आपस में झगड़ा हो तो संभव है वे चुप बैठी रहे ।
३ झुठा व्यक्ति --- एक मौलबी था । मौलबी ने कहा --- मै एक सुबह बधना लेकर शौच के लिए जा रहा था तभी अचानक तेज आँधी आयी और एक बकरा मेरे बधने(टोटी वाला बर्तन ) आकर गिरा मैने बधना हिलाया तो वह निकलकर भागने का प्रयास करने लगा । बधने के टोटी से बकरे का सारा शरीर निकल गया लेकिन उसकी पूंछ फंसी रह गयी। दरबारीयों ने आपस मे राय किया की ये मौलबी तो बाजी के करीब जा रहा है ।
दरबारीयों ने आपस मे विमर्श कर फैसला सुनाया । आँधी अगर बहुत तेज हो तो वो बकरे को उड़ा सकती है। बधना अगर बहुत बड़ा हो तो उसमे बकरा गिर सकता है । इसतरह मौलबी को भी पुरस्कार नही मिला।
४ झुठा व्यक्ति --- चौथे व्यक्ति ने कहा की महाराज आपके पुरखों पर एक बार भारी गरीबी आ गई थी । उस समय आप के दादा जी ने मेरे दादा जी से १ हजार स्वर्ण मुद्रा लिए थे । और कहा था कि मेरा पोता तुम्हारे पोते को ये स्वर्ण मुद्राएं लौटा _देगा । आज मै वही स्वर्ण मुद्राएं लेने आया हुॅं। 


अब अगर उसके बात को सच मानता है तो भी १ हजार सोने के सीक्के देने पड़ते है और अगर झूठ मानता है तो प्रतियोगिता के विजेता के रूप मे १ हजार सोने के सीक्के देने पड़ते है

गुरुवार, 15 सितंबर 2016

आम के पेड़ की सहृदयता


एक समय की बात है, एक बहुत बड़ा आम का पेड़ था। उस पर एक छोटा बच्चा रोज आकर खेल करता था।
वह वृक्ष पर चढ़कर वृक्ष की चोटी पर जाने का प्रयास करता। पेड़ की ठंढी छावँ पे खेलता और पेड़ की डाल्यों से झूम झूम कर प्यार करता। आम का पेड़ भी उसे बहुत प्यार  करता उसे लगता जैसे वो पाने ही शिशु को गोद में खेल रहा हो।


समय बितता गया.... छोटा लड़का अब बड़ा हो गया था अब वह पेड़ के इर्द गिर्द नहीं घूमता नहीं उसे पेड़ के साथ खेलने में विशेष रूचि रह गयी।
एक दिन लड़का पेड़ के पास आया। वह बहुत उदास था उसके चेहरे से उदासी साफ़ झलक रही थी।

आम के वृक्ष ने उसे अपने पास बुलाया और अपने साथ खेलने को कहा।

बच्चे ने उत्तर दिया - अब मैं बच्चा नहीं रहा जो पेड़ से खेलता रहूँ और पेड़ के इर्द गिर्द घूमता रहूँ। मुझे खेलने ने लिए खिलौने चाहिए और खिलौने  खरीदने के लिए पैसे चाहिए।

आम के वृक्ष ने उत्तर दिया ->प्यारे बच्चे मेरे पास तुम्हे देने के लिए पैसे  नहीं  है ,लेकिन तुम मेरे वृक्ष से आम के फल तोड़कर उन्हें बेचकर पैसे अर्जित कर सकते हो।
यह सुनकर बच्चा बहुत उत्साहित हुआ। वह आम के पेड़ पर चढ़कर आम तोड़ लिए और उन्हें बेचकर पैसे बनाने के लिए बाजार  चला गया। लड़का फिर वापस नहीं आया पेड़ उदास हो गया।

एक दिन लड़का वापस आया अब वह बड़ा होकर वयस्क पुरुष बन चूका था। आम का पेड़ लड़के को अपने पास देखकर बहुत उत्साहित था।
पेड़ ने बड़े प्यार से आवाज लगायी -> आवो मेरे साथ खेलो

वयस्क आवाज में जबाब मिला=> "मेरे पास खेलने के लिए ज्यादा समय नहीं है। मुझे अपने परिवार के लिए काम करना है। हमारे परिवार को रहने के लिए एक घर की जरुरत है मैं अपने परिवार के लिए एक घर बनाना चाहता हूँ क्या तुम हमें इस कार्य में मदद कर सकते हो ?"

आम के वृक्ष ने उत्तर दिया => तुम्हारे पास घर नहीं है इसका मुझे दुःख है लेकिन इसमें मैं कैसे तुम्हारी मदद कर सकता हौं मैं तो खुद बेघर हूँ। हां अगर तुम चाहो तो मेरी टहनियों शाखाओं को काट कर घर बना सकते हो।
वह आदमी ने पेड़ की टहनियों को काट कर पेड़ को अकेला छोड़कर चला गया। पेड़ अपने को अकेला पाकर फिर उदास हो गया। 

एक दिन गर्मी के मौसम में वह आदमी फिर वापस आया और पेड़ के पास रुका। उस आदमी को अपने पास देख का पेड़ बहुत खुश हुआ।

पेड़ ने फिर आवाज़ लगायी आवो मेरे साथ खेलो।
उस आदमी ने जबाब दिया मैं बहुत उदास हूँ और बूढा भी हो गया हूँ। मैं अपनी तनाव और चिंता दूर करने के लिये इस नदी में नौका विहार करना चाहता हूँ। क्या तुम मेरे लिए एक नाव सुझा सकते हो ?

तुम मेरी तनाव को काटकर इससे नाव वन सकते हो। इसके बाद तुम दूर तक नदी में अनेक विहार कर सकते हो और तुम्हारे सारे तनाव चिंता भी दूर हो जायेंगे।

उस आदमी ने आम के पेड़ की तना को काट कर नाव बनाया। नाव में बैठ कर वह दूर nadi में नौका विहार के लिए निकल गया और  बहुत दिन तक वापस नहीं आया पेड़ फिर उदास हो गया।

फिर बहुत दिनों बात वह आदमी आम के पेड़ के पास आया वह बहुत बूढा हो रखा था।
आम के वृक्ष ने उस बूढ़े व्यक्ति का स्वागत किये वह उसे बचपन के दिनों से देखता आया था।
आम के पेड़ ने उस व्यक्ति से कहा मुझे दुःख  है कि मैं तुम्हे कुछ नहीं दे सकता। मेरे पास आम के फल भी नहीं रहे जिससे मैं तुम्हारा स्वागत करता।
उस बूढ़े आदमी ने कहा रहने दो मेरे पास आम खाने के लिए दांत नहीं रहे। मेरे दांत टूट चुके हैं।

वृक्ष ने फिर कहा मेरे पास अब उतनी टहनियां  भी नहीं है जिसपर चढ़कर तुम अटखेलियां करते थे। 

बूढ़े आदमीं ने कहा मैं बहुत बूढा हो चूका हूँ अब मेरे से पेड़ पर नहीं चढ़ा जायेगा।

आम्र तरु ने कहा मैं बहुत बहुत शर्मिंदा हूँ की तुम्हे कुछ नहीं दे सकता।

उस आदमी ने कहा तुमने मुझे बहुत कुछ दिया है अब मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं उम्र के इस पड़ाव में बहुत थक गया हूँ मैं विश्राम करना चाहता हूँ।
बहुत अच्छा ! पुराने पेड़ की जड़ें आराम करने के लिए बहुत उपयुक्त होतीं हैं मेरे पास आओ और मेरी जड़ों पर लेटकर अपनी थकान दूर करो।

वह आदमी पेड़ की जड़ पर लेटकर आराम करने लगा और पेड़ बच्चे की सानिध्य पाकर बहुत खुश था।

इस  कहानी से  आप को क्या शिक्षा मिलती है

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सोमवार, 12 सितंबर 2016

Tin Mitra Kachhuwa, Hiran aur Kauwa

एक जंगल मे तीन जानवर मित्रता से रहते थे। तीनो मित्र एक दुसरे के काम आते और सुख दुख मे एक दुसरे की मदद करते। ये तीनो मित्र कछुआ , हिरण और कौआ था । ओ तीनो एक दुसरे को उनके दुष्मनो की सुचना देकर सतर्क कर देते। एक दीन कछुआ कुछ लापरवाही के कारण शिकारी के जाल मे फंस गया । कछुआ के बाक़ी मित्रो ने उसे शिकारी के जाल से मुक्त कर ने के लिए एक योजना बनाई । कौआ हिरण से कहा कि तुम शिकारी के मार्ग मे आगे जाकर मृत जानवर की तरह लेट जाओ। शिकारी मार्ग मे दुसरा शिकार देखकर संभव है कछुआ को जमीन पर रखकर तुमको लेने तुम्हारे तरफ जाए। मेरा एक मित्र चुहा वही पेड़ के नीचे सौ बील बनाकर रहता है। मै उसी पेङ पर बैठकर शिकारी की गतिविधि से तुम्हे अवगत कर दुगा और तुम अपनेपास आए शिकारी से सावधान होकर भाग निकलना ।उधर जब शिकारी तुमको लेने आ रहा होगा।मेरा मित्र चुहा कछुआ के बंधन को काट देगा और ओ पास के तालाब मे बिना बिलम्ब किए चला जाएगा।

रविवार, 11 सितंबर 2016

शिकारी, हंस और दुष्ट कौआ

एक बार की बात है़.एक शिकारी जंगल मे शिकार करने गया था. दिन भर शिकार के पीछे दुर दुर तक भागने के बाद भी वह उस दीन कोई शिकार नही कर सका. मृगया के स्रम से थककर वह एक पेड़ के नीचे लेटकर विस्राम करने लगा. आखेट से थके हुए व्याध को शीघ्र ही नींद लग गयी.
 कुछ देर बाद शिकारी के मुह पर धुप पड़ने लगा. उस पेड़ पर एक हंस बैठा था.हंस ने सोचा शरीर पर धुप पड़ने से शिकारी की नींद टुट जाएगी.अतः ओ अपना पंख फैलाकर छॉव कर दिया. धुप से परेशान शिकारी जो बार बार करवट बदल रहा था अब आराम से सोने लगा. 



कुछ देर बाद एक कौआ उड़ता हुआ आया और उसी पेड़ पर बैठ गया. कौए ने देखा की एक हंस पंख फैलाए बैठा है.उसने इसका कारण जानना चाहा. नीचे देखा तो पता चला हंस जी शिकारी के परोपकार मे लगे हैं. दुष्ट केजरीवाल रूपी कौए को हंस के इस स्वभाव से ईष्यॉ हो गयी. कौए ने अपनी दुष्टता दिखायी. वह हंस की नीचे वाली डाली पर बैठकर शिकारी के मुहपर मल विस्रजीत कर दिया और उड़कर भाग गया.
 शिकारी चौककर उठा .वह धनुष पर बाण चढाये सोया था. अपने उपर दृष्टी डाली तो पंख फैलाए एक हंस बैठा दिखा.शीघ्रता से निशाना साधकर ओ हंस के उपर छोड़ दिया.इस तरह दुष्ट कौए के कारण निःदोष हंस की जान चली गयी.

Note: इस कहानी से आपको क्या शिक्षा मिलती है? इस कहानी का moral  सुझाएँ !

गुरुवार, 8 सितंबर 2016

अच्छा आदमी और बुरा आदमी की खोज - दुर्योधन और युधिष्ठिर


पाण्डवों और कौरवों को शस्त्र शिक्षा देते हुए आचार्य द्रोण के मन में उनकी परीक्षा लेने की बात उभर आई । परीक्षा कैसे और किन विषयो में ली जाये इस पर विचार करते उन्हें एक बात सूझी कि क्यों न इनकी वैचारिक प्रगति और व्यवहारिकता की परीक्षा ली जाये । दूसरे दिन प्रात: आचार्य ने राजकुमार दुर्योधन को अपने पास बुलाया और कहा। वत्स, तुम समाज में से एक अच्छे आदमी की परख करके
उसे मेरे सामने उपस्थित करो।

 दुर्योधन ने कहा--- "जैसी आपकी इच्छा "
और वह अच्छे आदमी की खोज में निकल पड़ा है। कुछ दिनों बाद दुर्योधन
बापस आचार्य के पास आया और कहने लगा--" 'मैंने कई नगरों, गाँवो का
श्रमण क्रिया परन्तु कहीं कोई अच्छा आदमी नहीं मिला । इस कारण में
किसी अच्छे आदमी को आपके पास न ला सका ।"

अबकी बार उन्होंने राजकुमार युधिष्ठिर को अपने पास बुलाया और
कहा -- "बेटा ! इस पृथ्वी पर से कोई बुरा आदमी ढूंढ़ कर ला दो । युधिष्ठिर
ने कहा-ठीक है महाराज, मैं कोशिश करता हुँ।" इतना कहने के बाद
वे बुरे आदमी की खोज में चल दिये।

 काफी दिनों के बाद युधिष्ठिर आचार्य के पास आये । आचार्य ने
पूछा- क्यों ? किसी बुरे आदमी को साथ लाये क्या ? युधिष्ठिर ने
कहा -"महाराज मैंने सर्वत्र बुरे आदमी की खोज की परन्तु मुझे कोई बुरा
आदमी मिला ही नहीं । इस कारण में खाली हाथ लौट आया हूँ।"

सभी शिष्यों ने आचार्य से पूछा - " 'गुरुवर, ऐसा क्यों हुआ कि दुर्योधन
को कोई अच्छा आदमी नहीं मिला और युधिष्ठिर को कोई बुरा आदमी
नहीं मिला।
आचार्य बोले- "बेटा ! जो व्यक्ति जैसा होता है उसे सारे लोरा अपने जैसे दिखाई पड़ते हैं है इसलिए दुर्योधन को कोई अच्छा व्यक्ति नहीं मिला और यधिष्टिर को कोई बुरा आदमी नहीं मिल सके "।

भक्त की निश्छलता - Guileless Devotee


भक्त की निश्छलता
एक बहुत ही भोला व्यक्ति था. शारीरिक कष्ट और गरीबी से परेशान था। उसे किसी व्यक्ति ने सलाह दिया कि तुम भगवान की पूजा क्यों नहीं करते।  भगवान प्रसन्न होंगे तो तुम्हारे सारे कष्ट और निर्धनता दूर  हो जाएगी। लोगों की परामर्श पर वो भगवान विष्णु की आराधना करने लगा।
वह बहुत प्रेम से भगवान के लिए सुबह उठ कर फूल  चुनता और विष्णु मंदिर जाकर भगवान का श्रद्धा सुमन अर्पित करता। भगवान की स्तुति कर उनसे अपने रोग क्लेश और दरिद्रता को दूर  करने का अनुरोध करता। एक महीने हो गए उसको भगवन विष्णु के पूजा करते हुए और मंदिर जाते हुए लेकिन उसके कष्ट दूर नहीं हुए।
एक दिन भगवान की मंदिर से आते हुए रास्ते में उसे एक दूसरा भक्त मिला जो भगवन शिव की पूजा करके शिव मंदिर से लौट था। विष्णु भक्त ने शिव भक्त से समाचार पूछा और अपनी  व्यथा सुनाई। विष्णु भक्त भोला भाई मई एक महीने से भगवन विष्णु की पूजा कर रहा हूँ लेकिन कुछ लाभ नहीं मिला।  मेरे संकट और क्लेश पूर्ववत सात रहे हैं। शिव भक्त ने उससे भगवन शिव की आराधना करने को कहा। शिव भक्त ने कहा की भगवन शिव आशुतोष है वो हमारी जल्दी सुनते हैं। भगवन शिव धरती पर रहते हैं धरती के देवता हैं संपर्क साधना आसान है शिव से। भगवान विष्णु तो वैकुंठ धाम रहते है लोकल कॉल भी नहीं लगती वहाँ STD लगती है।   
शिव भक्त की बात से सहमत होकर भोला भक्त दूसरे दिन शिव मंदिर पहुँचा। शिव  मंदिर पहुँच कर भगवान शिव का जलाभिषेक किया और अगरबत्ती जलने के लिए आग प्रज्वलित किया। 


अचानक उसका ध्यान शिव मंदिर में रखे विष्णु के एक छोटी सी प्रतिमा पर गया। भगवान विष्णु के व्यवहार से यह भक्त रुष्ट था।  वो नहीं चाहता था की शिव को खुश करने के लिए दिखाए जा रहे अगरबत्ती की सुगंध विष्णु सूंघ ले। इसको रोकने के लिए वो दिया के बाती से रुई निकल कर विष्णु प्रतिमा की नाक में डालने ही वाला था की मूर्ति बोल पड़ी। भगवान विष्णु भक्त की निश्छलता से प्रसन्न हो गए। भगवान ने कहा कितना भोला भक्त है इसकी आस्था देखो मेरे उपस्थिति में इसको कितना विश्वास है। भगवन विष्णु ने प्रकट होकर उस भक्त को दर्शन दिए और उसके सारे कष्ट दूर हो गए।   

सारांश :-> भगवान में सच्ची आस्था पूजा को सार्थक बनाती है।

बुधवार, 7 सितंबर 2016

चतुर कौआ - Clever Crow

जून का महीना था । धूप बडी तेज पड़ रहीं थी।
पशु और पक्षी भी प्यास से घबरा रहे थे । सरोवरों
और तालाबों में पानी सूख गया था।


एक कौआ बडा प्यासा था । वह उड़-उड़कर कई
जगह गया, पर उसे कहीं पानी की एक बूंद भी न
दिखाई दी । हारकर वह एक बगीची में गया । वहाँ उसे एक
लम्बा-सा बर्तन (सुराही )  दिखाई दिया। कौए ने उस
बर्तन के पास जाकर उसमें झांककर देखा । उसके तल
में थोड़ा सा पानी था । कौए की चोंच वहाँ तक पहुंच
नहीं सकती थी । पर उसने आशा नहीं छोडी ।



उसने चारों ओर देखा । समीप ही कुछ कंकड़
पड़े थे । तुरन्त उसे एक उपाय सुझा। वह एक-एक
करके उन कंकडों को लाकर बर्तन में डालने लगा ।
इससे पानी ऊपर चढ़ने लगा । शीघ्र ही पानी पूरा ऊपर किनारे तक आ गया ।
कौए की प्रसन्नता का ठिकाना न था । उसने पानी पीकर अपनी जान बचाई ।

शिक्षा-कठिनाई में प्रयत्न करने पर कोई न कोई
उपाय सूझ ही जाता है ।

चालाक बन्दर और मगर - Clever monkey and crocodile


किसी नदी के किनारे एक बहुत बहा पेड़ था । उस पर एक बन्दर रहता था । उस पेड़ पर बड़े मीठे फल लगते थे । बन्दर उन्हें भरपेट खाता और मौज उडाता । वह
अकेले ही मजे में दिन गुजार रहा था ।

एक दिन एक मगर उस नदी में से पेड़ के नीचे आया। बन्दर के पूछने पर मगर ने बताया की वह वहाँ खाने की तलाश में आया है । इम पर बन्दर ने पेड़ से तोड़कर बहुत से मीठे फल मगर को खाने के लिए दिए। इस तरह बन्दर और मगर में दोस्ती हो गई । अब मगर हर रोज़ वहाँ आता और दोनों मिलकर खूब फल खाते । बन्दर भी एक दोस्त पाकर बहुत खुश था ।

एक दिन बात-बात में मगर ने बन्दर को बताया की उसकी एक पत्नी है जो नदी
के उस पार उसके घर में रहती है । तब बन्दर ने उम दिन बहुत से मीठे फल मगर को उसकी पत्नी के लिए साथ ले जाने के लिए दिए। इस तरह मगर रोज़ जी भरकर फल खाता और अपनी पत्नी के लिए भी लेकर जाता। मगर की पत्नी को फल खाना तो अच्छा लगता पर पति का देर से घर लौटना पसन्द
नहीं था । एक दिन मगर की पत्नी ने मगर से कहा कि अगर वह बन्दर रोज-रोज इतने मीठे फल खाता है तो उसका कलेजा कितना मीठा होगा । मैं उमका कलेजा खाऊँगी। मगर ने उसे बहुत समझाया पर वह नहीं मानी। मगर जोरू का गुलाम था। उसके पत्नी के आगे उसकी एक न चलती थी।

पत्नी से मजबूर होकर मगरमच्छ दावत के बहाने बन्दर को  अपनी पीठ पर बैठाकर अपने घर लाने लगा । नदी बीच में उसने बन्दर को अपनी पत्नी की कलेजे वाली बात बता दी । इस पर बन्दर ने कहा कि, वो तो अपना कलेजा पेड़ पा ही छोड छाया है। वह उसे हिफाजत से पेड़ पर रखता है। इसलिए उसे वापिस जाकर कलेजा लाना पडेगा । मगर बन्दर को वापिस पेड़ के  पास ले गया । बन्दर छलांग मरकर पेड़ पर चढ़ गया । मगर नीचे बन्दर का इंतिजार कर रहा था। कुछ देर इतंजार करने के बाद मगर बन्दर से पूछा ? मित्र क्या हुआ कलेजा मिला की नहीं जल्दी आओ। बन्दर  हँसकर कहा कि "जाओ मूर्खराज  घर जाओ और अपनी पत्नी से कहना कि तुम
दुनिया के सबसे बड़े मूर्ख हौ । भला कोई  भी अपना कलेजा निकालकर अलग रख सकता है ।"

बन्दर की इम समझदारी से हमे पता चलता है कि मुसीबत के वक्त हमेँ कभी धैर्य
नही खोना चाहिए।

शनिवार, 3 सितंबर 2016

धूर्त बगुला और मछलिया - Cunning Heron and Fish


एक सरोवर में काफी सारी मछलियां रहती थीं। सरोवर में प्रचुर जल था। जल में ख़ुशी ख़ुशी रहती थी और बड़ी प्रसन्नता से जल क्रीणा करते हुए इस किनारे से उस किनारे तक तैरते रहती थी।
एक बार ग्रीष्म ऋतू में भीषण गर्मी पड़ी सरोवर का जल सूखने लगा। उस साल मानसून में बरसात भी नहीं हुई सरोवर में जल बहुत ही कम हो गया। इससे मछलियों का जीवन कष्टप्रद हो गया.
सभी मछलिया अपने भविष्य के बारे में चिंतित रहा करती थीं। 

एक बगुला था जो सरोवर से  मछलियों का शिकार किया करता था। एक दिन सरोवर किनारे बैठ कर  बगुला रोने लगा। किंनारे पर तैरती हुई मछलियों ने  बगुले को रोते हुए देखा और उससे रोने का कारण पूछा ? बगुले ने बताया की इस सरोवर में बहुत ही कम जल शेष बचा है इससे तुम लोगों  का जीवन संकट में आ गया है। इसके अलावा एक और भारी संकट है जो टाला नहीं जा सकता। पास के गावँ के लोगो ने अगले सप्ताह इसमें मछली पकड़ने के लिए जाल डालने की योजना बनाई है। मैं इसी सब बातों से दुखी हूँ। भोली भली मछलियों को कपटी बगुले के बातों पर विश्वास लगने लगा। मछलियों  ने बगुले को अपना हितैषी जानकार उससे इसका समाधान जानने के लिए कोई उपाय पूछा।
कपटी धूर्त बगुला तो इसी प्रतीक्षा में था। बगुले ने कहा की अगर तुम सब अगर चाहो तो मैं तुम लोगों को बगल के दूसरे गावँ के तालाब में पहुँचा सकता हूँ। वहाँ तुम सभी सुरक्षित रह पाओगी।  उस तालाब का जल कभी नही सुखता।
प्राण रक्षा के लिए सभी मछलियां बगुले के साथ दूसरे सरोवर में जाने को तैयार हो गयी।
बगुला अपने चोंच में मछली को पकड़ कर उड़ता और कुछ दूर जाकर एक पेड़ पर बैठ कर उन्हें खा लेता था। धीरे धीरे सभी मछलियों के साथ ऐसा ही किया। सरोवर से मछलिया ख़त्म होने लगीं। 

उस सरोवर में एक केकड़ा भी रहता था। केकड़े  ने भी बगुले से गुहार लगायी की बगुला भाई मुझे भी यहाँ से ले चलो। बगुला पहले तो तैयार नहीं हुआ लेकिन केकड़े के बहुत विनय करने पर बगुला मान गया। क्योंकि सरोवर में अब तो मछलिया भी नहीं बची थी। बगुला केकड़े को अपने चोंच से नहीं पकड़ पा रहा था। अतः केकड़ा बगुले के गर्दन पर बैठ गया। कुछ दूर बगुले के साथ उड़ने के बाद केकड़े ने पूछा की बगुला भाई और कितना दूर है सरोवर ? बगुले ने कहा की अभी दूर है और एक पेड़ पर बैठ गया. केकड़े ने देखा की पेड़ के नीचे मछलियों की हड्डिया और पंख पड़े हैं।  केकरे को समझते देर न लगी कि बगुले ने छल से भोली भाली मछलियों का शिकार किया है केकरा तो बगुले के गर्दन पकडे बैठा ही था, अपने दाँतों से बगुले की गर्दन दबाकर धूर्त बगुले की कहानी ख़त्म कर दिया। 

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