पंचतंत्र की कहानियां कैसे बनी

एक समय की बात है अमरशक्ति नाम का राजा  महिलरोपयम के दक्षिण के प्रदेश में राज्य करता था। उसके पास तीन जिद्दी और मुर्ख शरारती  लड़के थे। उन बच्चों को पढ़ने से चिढ थी। राजा ने अपने लड़कों को पढ़ने के लिए कई अध्यापक नियुक्त किये। अध्यापक बच्चों को बहला फुलसला कर जैसे ही पढ़ना शुरु करते बच्चे सतर्क हो जाते और अध्यापक को मिलकर चिढ़ाने लगते और उसे भागने का नाना यत्न करने लगते। ऐसा जानकार की मेरे बच्चे कुछ नहीं सिख नहीं सकते राजा ने पुरे राज्य में घोषणा करवा दिया जो कोई मेरे इन जिद्दी जड़ बच्चों को पढ़कर शिक्षित कर देगा उस मुंहमांगा इनाम दिया जायेगा।
राजा के कर्मचारी यह फरमान पुरे राज्य में फैला दिए। इस घोषणा की खबर आचार्य विष्णु शर्मा के कान  में पड़ी। विष्णु शर्मा ने राजा के  जड़मति बच्चों को पढ़ना शुरू किया।

विष्णु शर्मा बच्चों को कहानिया सुनाने लगे।  बच्चे बड़ी तन्मयता से उनकी कहानी सुनाने  लगे। साथ ही वो शरारती बालक सतर्क भी थे की कही ये उपाध्याय भी धोके से और अध्यापकों की तरह पढ़ना न शुरू कर दे। बच्चों को जानवरों की कहानी  सुनाकर कहानी के माध्यम से विष्णु शर्मा नैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ने लगा।  बच्चे बड़ी तन्मयता से उनकी रोचक कहानिया सुनते। विष्णु शर्मा कहानी के अंत में कहानी का सारांश सुनाते और बच्चों से कहानी से प्रेरणा के रूप में शिख लेने को बोलते।

इसी अध्ययन के क्रम में विष्णु शर्मा ने पंचतंत्र की रचना की। जिसकी कहानियां बहुत ही रोचक है। कहानी के सारे पात्र मुख्यतः जानवर पशु पक्षी होने से यह बच्चों में काफी लोकप्रिय है। आज के समय में जैसे बच्चे कार्टून के प्रति ज्यादा आकर्षित होते है पंचतंत्र भी अब से पहले बच्चों में एक ख़ास आकर्षण था और आज भी है।  कई विद्वान तो पंचतंत्र के कहानियों का कार्टून में रूपांतरण किये हैं।
पंचतंत्र के पांच अंग हैं, जिसके कारण इसे पंचतंत्र की संज्ञा दी गयी है।
पंचतंत्र के पांच भाग 
   १) मित्रभेद (मित्रों में आपस में मनमुटाव एवं अलगाव)
   २)  मित्रलाभ या मित्रसंप्राप्ति (मित्र बनकर उससे लाभ लेना )
   ३) काकोलुकीयम् (कौवे एवं उल्लुओं की कथा)
   ४) लब्धप्रणाश (मृत्यु या विनाश के आने पर; यदि जान पर आ बने तो क्या?)
   ५) अपरीक्षित कारक (जिसको परखा नहीं गया हो उसे करने से पहले सावधान रहें; हड़बड़ी में क़दम न उठायें)

यहाँ पढ़े मत्रभेद की कहानी -> मित्रभेद  

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