Merchant Five Children Tuti, Fati, Jali, Ganda, Panchar- कंजूस सेठ - Hospitality -

सेठ की पांच संतान टूटी, फटी, जली, गन्दा, पंचर - अतिथि सत्कार  


एक कंजूस सेठ था। उसकी ५ संतान थी। इसमें २ बेटे और ३ बेटियां थी। उसने अपने कंजूसी को और सहज बनने के लिए बेटे बेटियों का नाम कुछ इस प्रकार रखा था। टूटी, फटी, जली, गन्दा और पंचर। टूटी, फटी और जली ये तिन बेटियां थी। गन्दा और पंचर दो बेटे थे। इन महाशय के घर कोई अतिथि आता नहीं था, अगर कोई आ भी गया गलती से तो उसकी ऐसी आव भगत करते के दुबारा आने का नाम नहीं लेता।


एक बार एक अतिथि महोदय इनके घर आये। ये महोदय सेठ जी के बचपन के मित्र सहपाठी रहे थे। सेठ जी अपने द्वार पर आये मित्र को देख कर सावधान हो गए। अपने मित्र के स्वागत करने के अंदाज में सेठ जी ने कहा आवो आवो मित्र बहुत दिन हो गए तुम्हारे दर्शन को।
मित्र के स्वागत में बैठने के लिए आसान देने के लिए साहुकार ने अपने बड़ी बेटी को आवाज लगायी
"बेटी टूटी! चारपाई लाना"
मित्र महोदय ने समझा मेरे बैठने के लिए टूटी चारपाई माँगा रहा है। गजब का स्वागत  है इसके यहाँ अतिथि का। सेठ जी के मित्र मन मारकर उस चारपाई पर बैठंने को तैयार हुए। सेठ जी ने उन्हें रोकते हुए कहा अरे ऐसे कैसे बैठेंगे। रुकिए रुकिए चादर बिछाता हूँ इसपर। चादर के लिए सेठ जी ने अपने दूसरी बेटी को आवाज लगायी।
"फटी! चादर लाना "
अतिथि महोदय की परेशानी और बढ़ते जा रही थी। वो खिन्न मन से उस चादर पर बैठ गए जो किनारे पर सचमुच फटी थी। अब स्वागत के क्रम में अथिति को कुछ जलपान को पूछना था। सेठ जी ने अपने पहले बेटे गन्दा को आवाज़ लगायी।
"गन्दा! पानी लाना "
गन्दा पानी लेकर स्वागत में पहुंचा। गन्दा पानी का नाम सुनकर अतिथि महोदय का चित खिन्न हो चूका तो उन्होंने कहा - अरे रहने दीजिये इसकी क्या जरुरत है। लेकिन मित्र के आग्रह पर अतिथि ने वह पानी पी लिया।
सेठ जी के मित्र ने बचपन की कुछ पुरानी यादें साझा की। बातचीत ख़त्म होने पर अतिथि चलने को तैयार हुए। सेठ जी ने उन्हें रोकते हुए कहा अरे भोजन का समय हो रखा है तुम्हे बिना खिलाए अपने द्वार से विदा करू तो मुझे पाप लगेगा। अतिथि को भोजन कराने के लिए सेठ ने अपने तिसरी बेटी जली को आवाज़ लगायी।
"बेटी जली! रोटी ला"
जली रोटी का नाम सुनकर अतिथि का ह्रदय जल उठा। अपने मित्र के प्रति घृणा और बढ़ गयी। इस बात को जाहिर नहीं होने दिया। अतिथि ने सोचा जल्दी से भोजन का इससे विदा लेता हूँ। अगर मई कुछ देर यहाँ और रुक तो, इसके स्वागत से मैं पागल हो जाऊंगा। मित्र महोदय ने जैसे तैसे रोटियां खा ली। अब चलने को तैयार हुए। अतिथि ने मित्र से विदा माँगा और चलें को तैयार हुए। सेठी जी ने मित्र से कहा अरे पैदल क्यों जाओगे मित्र मेरा बेटा तुम्हे स्कूटर से स्टेशन छोड़ देता है। सेठ जी ने अपने दूसरे बेटे को आवाज़ लगायी
"बीटा पंचर! स्कूटर लाना "
अतिथि महोदय ऐसा सुनकर दौड़ कर भागने लगे।  जाते जाते प्रण किया इस कंजूस के घर कभी नहीं आऊंगा. सेठ जी अपने स्वागत करने के अंदाज से खुस थे। 

 

एक कंजूस सेठ था। उसकी ५ संतान थी। इसमें २ बेटे और ३ बेटियां थी। उसने अपने कंजूसी को और सहज बनने के लिए बेटे बेटियों का नाम कुछ इस प्रकार रखा था। टूटी, फटी, जली, गन्दा और पंचर। टूटी, फटी और जली ये तिन बेटियां थी। गन्दा और पंचर दो बेटे थे। इन महाशय के घर कोई अतिथि आता नहीं था, अगर कोई आ भी गया गलती से तो उसकी ऐसी आव भगत करते के दुबारा आने का नाम नहीं लेता।

एक बार एक अतिथि महोदय इनके घर आये। ये महोदय सेठ जी के बचपन के मित्र सहपाठी रहे थे। सेठ जी अपने द्वार पर आये मित्र को देख कर सावधान हो गए। अपने मित्र के स्वागत करने के अंदाज में सेठ जी ने कहा आवो आवो मित्र बहुत दिन हो गए तुम्हारे दर्शन को।
मित्र के स्वागत में बैठने के लिए आसान देने के लिए साहुकार ने अपने बड़ी बेटी को आवाज लगायी
"बेटी टूटी! चारपाई लाना"
मित्र महोदय ने समझा मेरे बैठने के लिए टूटी चारपाई माँगा रहा है। गजब का स्वागत  है इसके यहाँ अतिथि का। सेठ जी के मित्र मन मारकर उस चारपाई पर बैठंने को तैयार हुए। सेठ जी ने उन्हें रोकते हुए कहा अरे ऐसे कैसे बैठेंगे। रुकिए रुकिए चादर बिछाता हूँ इसपर। चादर के लिए सेठ जी ने अपने दूसरी बेटी को आवाज लगायी।
"फटी! चादर लाना "
अतिथि महोदय की परेशानी और बढ़ते जा रही थी। वो खिन्न मन से उस चादर पर बैठ गए जो किनारे पर सचमुच फटी थी। अब स्वागत के क्रम में अथिति को कुछ जलपान को पूछना था। सेठ जी ने अपने पहले बेटे गन्दा को आवाज़ लगायी।
"गन्दा! पानी लाना "
गन्दा पानी लेकर स्वागत में पहुंचा। गन्दा पानी का नाम सुनकर अतिथि महोदय का चित खिन्न हो चूका तो उन्होंने कहा - अरे रहने दीजिये इसकी क्या जरुरत है। लेकिन मित्र के आग्रह पर अतिथि ने वह पानी पी लिया।
सेठ जी के मित्र ने बचपन की कुछ पुरानी यादें साझा की। बातचीत ख़त्म होने पर अतिथि चलने को तैयार हुए। सेठ जी ने उन्हें रोकते हुए कहा अरे भोजन का समय हो रखा है तुम्हे बिना खिलाए अपने द्वार से विदा करू तो मुझे पाप लगेगा। अतिथि को भोजन कराने के लिए सेठ ने अपने तिसरी बेटी जली को आवाज़ लगायी।
"बेटी जली! रोटी ला"
जली रोटी का नाम सुनकर अतिथि का ह्रदय जल उठा। अपने मित्र के प्रति घृणा और बढ़ गयी। इस बात को जाहिर नहीं होने दिया। अतिथि ने सोचा जल्दी से भोजन का इससे विदा लेता हूँ। अगर मई कुछ देर यहाँ और रुक तो, इसके स्वागत से मैं पागल हो जाऊंगा। मित्र महोदय ने जैसे तैसे रोटियां खा ली। अब चलने को तैयार हुए। अतिथि ने मित्र से विदा माँगा और चलें को तैयार हुए। सेठी जी ने मित्र से कहा अरे पैदल क्यों जाओगे मित्र मेरा बेटा तुम्हे स्कूटर से स्टेशन छोड़ देता है। सेठ जी ने अपने दूसरे बेटे को आवाज़ लगायी
"बीटा पंचर! स्कूटर लाना "
अतिथि महोदय ऐसा सुनकर दौड़ कर भागने लगे।  जाते जाते प्रण किया इस कंजूस के घर कभी नहीं आऊंगा. सेठ जी अपने स्वागत करने के अंदाज से खुस थे। 

 

एक कंजूस सेठ था। उसकी ५ संतान थी। इसमें २ बेटे और ३ बेटियां थी। उसने अपने कंजूसी को और सहज बनने के लिए बेटे बेटियों का नाम कुछ इस प्रकार रखा था। टूटी, फटी, जली, गन्दा और पंचर। टूटी, फटी और जली ये तिन बेटियां थी। गन्दा और पंचर दो बेटे थे। इन महाशय के घर कोई अतिथि आता नहीं था, अगर कोई आ भी गया गलती से तो उसकी ऐसी आव भगत करते के दुबारा आने का नाम नहीं लेता।

एक बार एक अतिथि महोदय इनके घर आये। ये महोदय सेठ जी के बचपन के मित्र सहपाठी रहे थे। सेठ जी अपने द्वार पर आये मित्र को देख कर सावधान हो गए। अपने मित्र के स्वागत करने के अंदाज में सेठ जी ने कहा आवो आवो मित्र बहुत दिन हो गए तुम्हारे दर्शन को।
मित्र के स्वागत में बैठने के लिए आसान देने के लिए साहुकार ने अपने बड़ी बेटी को आवाज लगायी
"बेटी टूटी! चारपाई लाना"
मित्र महोदय ने समझा मेरे बैठने के लिए टूटी चारपाई माँगा रहा है। गजब का स्वागत  है इसके यहाँ अतिथि का। सेठ जी के मित्र मन मारकर उस चारपाई पर बैठंने को तैयार हुए। सेठ जी ने उन्हें रोकते हुए कहा अरे ऐसे कैसे बैठेंगे। रुकिए रुकिए चादर बिछाता हूँ इसपर। चादर के लिए सेठ जी ने अपने दूसरी बेटी को आवाज लगायी।
"फटी! चादर लाना "
अतिथि महोदय की परेशानी और बढ़ते जा रही थी। वो खिन्न मन से उस चादर पर बैठ गए जो किनारे पर सचमुच फटी थी। अब स्वागत के क्रम में अथिति को कुछ जलपान को पूछना था। सेठ जी ने अपने पहले बेटे गन्दा को आवाज़ लगायी।
"गन्दा! पानी लाना "
गन्दा पानी लेकर स्वागत में पहुंचा। गन्दा पानी का नाम सुनकर अतिथि महोदय का चित खिन्न हो चूका तो उन्होंने कहा - अरे रहने दीजिये इसकी क्या जरुरत है। लेकिन मित्र के आग्रह पर अतिथि ने वह पानी पी लिया।
सेठ जी के मित्र ने बचपन की कुछ पुरानी यादें साझा की। बातचीत ख़त्म होने पर अतिथि चलने को तैयार हुए। सेठ जी ने उन्हें रोकते हुए कहा अरे भोजन का समय हो रखा है तुम्हे बिना खिलाए अपने द्वार से विदा करू तो मुझे पाप लगेगा। अतिथि को भोजन कराने के लिए सेठ ने अपने तिसरी बेटी जली को आवाज़ लगायी।
"बेटी जली! रोटी ला"
जली रोटी का नाम सुनकर अतिथि का ह्रदय जल उठा। अपने मित्र के प्रति घृणा और बढ़ गयी। इस बात को जाहिर नहीं होने दिया। अतिथि ने सोचा जल्दी से भोजन का इससे विदा लेता हूँ। अगर मई कुछ देर यहाँ और रुक तो, इसके स्वागत से मैं पागल हो जाऊंगा। मित्र महोदय ने जैसे तैसे रोटियां खा ली। अब चलने को तैयार हुए। अतिथि ने मित्र से विदा माँगा और चलें को तैयार हुए। सेठी जी ने मित्र से कहा अरे पैदल क्यों जाओगे मित्र मेरा बेटा तुम्हे स्कूटर से स्टेशन छोड़ देता है। सेठ जी ने अपने दूसरे बेटे को आवाज़ लगायी
"बीटा पंचर! स्कूटर लाना "
अतिथि महोदय ऐसा सुनकर दौड़ कर भागने लगे।  जाते जाते प्रण किया इस कंजूस के घर कभी नहीं आऊंगा. सेठ जी अपने स्वागत करने के अंदाज से खुस थे। 

 

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