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मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

आलौकिक छात्र समूह - Four Learned Fool

एक गुरु कुल में चार ब्राम्हण रहते थे।  चरों विद्या में अति निपुण थे पर व्यवहारिक ज्ञान की कमी थी। गुरूजी उनलोगों को शिक्षा के व्यवहारिकता पर महत्व देने की बार बार परामर्श देते थे।  लेकिन वो चरों विद्यार्थी  विद्यावान तो खूब हुए लेकिन रहे अलौकिक ही .

शिक्षा समाप्ति के बाद जब ओ घर को लौट रहे थे तो रस्ते में उन्हें एक शव यात्रा दिखाई दिया।  किसी महाजन ("बनिए") की शव यात्रा थी। 
पहले ब्राम्हण ने पुस्तक निकल कर देखा। पुस्तक में लिखा था "महाजनों येन गतः स पन्थाः " . इसका सही अर्थ तो हुआ की महापुरुष लोग जिस मार्ग पर चलते है, वही अनुसरणीय मार्ग है। पर अलौकिक ब्राम्हण ने समझा कि, महाजन बनिए जिस रस्ते से जा रहे है वही सही रास्ता है , और अपने मित्रों को ऐसा समझाकर बनियों का अनुसरण करने लगा।  वह जा कर वे देखते है कि एक गदहा श्मशान में चार रहा है। अब दूसरे पंडित ने पुस्तक में देखा तो उसे ये श्लोक मिला "राजद्वारे श्मशाने च यह तिष्ठति सह वान्धवः।
अर्थात राजा के दरबार में किसी संकट की स्थिति में और श्मशान घाट में जो ठहरता है वो भाई है।  यह समझकर ओ बिद्यार्थी उस गर्धभ से गले मिलाने लगे और उसका सम्मान करने लगे।
धोबी ऐसा करता देख उन क्षेत्रों की खूब पिटाई किया। वहां से भाग कर वो अपने राह पर चल पड़ें।  एक ग्रामीण के यहाँ रात्रि विश्राम किये।  उस ब्यक्ति ने अतिथियों को सम्मान में कढ़ी पकौड़े खाने को दिए .
अब पुस्तकस्थ विद्याभ्यसि ब्राम्हण पुस्तक में देखते है , कि लिखा है "छिद्रेसु अनर्थः बाहुली भवन्ति" यानि छिद्र में बहुत से बेकार चीज़ होतें हैं . ऐसा समझकर ओ सभी छेद वाले पकौड़े त्याग कर विना भोजन किये चल दिए .
रस्ते में नदी थी उसको पर कर के जाना था . अब नदी पार कैसे करें।  नदी में एक पता तैरता हुआ आ रहा था।  इसपर चौथे ब्राम्हण ने कहा रुको मित्रों मैं कुछ समाधान देखता हूँ। उसने पुस्तक में देखा तो लिखा था, "यत्पत्रं आगमिष्यति तस्मान्सेव अस्मांस्तरिस्यति " यानि जो पत्र तैरता आ रहा है वही हमें पार उतरेगा। यह कह कर वह ब्राम्हण पत्र पर चढ़ गया।

उसे डूबता देखा मित्रों ने कहा। पुस्तक में देखो अब हमें क्या करना चाहिए। पुस्तक के अनुसार "सर्व नासे समुत्पना अर्धम त्यजति पण्डिताः"  इसका सही अर्थ - सर्वनाश की स्थिति में विद्वत जन आधा का त्याग करते है आधा बचा लेते हैं.
ऐसा कह कर उसने डूबता मित्र की गाला काट कर , सर्व नाश की स्थिति में आधा बचाने का अलौकिक "अब्यवहरिक " प्रयास किया।

बुधवार, 20 अप्रैल 2016

दरिद्र ब्राम्हण लालची बनिया और डपोर शंख

डपोर शंख की  कहानी

एक बार एक दरिद्र ब्राम्हण भिक्षा वृत्ति से अपना और अपने परिवार का भरण पपोषण किया करता था। दारिद्र्य दुःख से परेशान ब्राम्हण को किसी ने सुझाव दिया की आप समुद्र के पास जाएँ समुद्र रत्नों के खान हैं ओ कुछ रत्नादि आप को दे देंगे आप की दरिद्रता दूर हो जाएगी. यह सुन कर ब्राम्हण देवता समुद्र की ओर चल पड़े . बहुत दिन तक चलते हुए रात्रि विश्राम करते हुए ब्राम्हण समुद्र के पास पहुंचे

समुद्र की पूजा करने के बाद ब्राम्हण ने समुद्र से अपने भरण पोषण के लिए धन/ रत्नादि याचना की।
समुद्र ने ब्राम्हण को दैनिक जीवन यापन के लिए इतना धन देने का विचार किया की उसका भरण पोषण हो सके और भोगों में आसक्ति न हो।
ऐसा सोचकर समुद्र ने ब्राम्हण को शंखी ( छोटा शंख ) देते हुए कहा कि ये शंखी ले जावो पूजनोपरांत शंखी बजाने के बाद पांच रुपये के याचना करोगे तो ये तुम्हे पांच रुपये दे देगी. ऐसा तुम प्रतिदिन कर सकते हो.
ब्राम्हण समुद्र को प्रणाम कर बड़े हर्ष के साथ विदा हुआ।  दिन भर की यात्रा के बाद रात्रि में एक वणिक के यहाँ विश्राम किया. ब्राम्हण को उत्सुकता थी कि, जो समुद्र ने कहा है ओ सही है या नहीं इसका परिक्षण किया जाये। ब्राम्हण ने संध्या पूजन के लिए बनिया से पुष्प, जल, आसान आदि माँगा.
अब ब्राम्हण ने पूजन करने के बाद शंखी से पांच रुपये की याचनी की।  शंखी ने पांच रुपये दे दिए.
यह सब देख कर बनिए को लालच लग गयी , ओ ब्राम्हण के जीविकोपार्जन वाली शंखी को धन बर्धक यन्त्र समाज बैठा।  मन में विचार किया , कैसे भी मैं इस शंखी को ब्राम्हण के साथ छल कर के ले लेता हूँ. फिर दिन भर खूब पूजा करूँगा और शंख बज बजा कर नगर का सर्वश्रेष्ठ नागरिक बन जाऊंगा .
फिर ओ अपने पुरोहित के यहाँ  गया और उनका शंखी लेते आया। ब्राम्हण के सो जाने के बाद उसने शंखी बदल लिया।
अब ब्राम्हण घर आ पूजा करने के बाद शंखी से पांच रुपये मांगता है, तो शंखी तो सही थी नहीं जो उसे धन प्राप्ति होती. अब ब्राम्हण समुद्र पर क्रोधित हुआ और समुद्र के पास उलाहना  ले के पहुंचा की आपने मुझे झूट बोल कर सिर्फ एक बार पांच रुपये देने वाले शंखी दिए है .
समुद्र ने दुखी ब्राम्हण से उसके यात्रा का बृत्तान्त सुना। जब उसने कहा की मैं रास्ते में एक बनिए के यहाँ रुक था तो समुद्र देवता समझ गए की बनिए ने ब्राम्हण के साथ छल किया है। समुद्र ने अब ब्राम्हण को बड़ा शंख दिया और कहा की रात्रि विश्राम उसी बनिए के घर करना। लालच एक बशीभूत बनिए ने ब्राम्हण का इस बार और अधिक स्वागत किया।  उसे लगा की ब्राम्हण को हमारे छल का पता नहीं है या इनके पूजन में ओ सकती है की ये किसी शंखी से पांच रुपये प्राप्त कर सकतें हैं, नहीं तो ये हमारे घर क्यों ठहरते।
संध्या पूजन के बाद जब ब्राम्हण ने शंख से पांच रुपये मांगे , तो शंख ने कहा कि पांच क्यों दस ले लो
फिर जब दस रुपये माँगा तो शंख ने कहा की दस क्यों बीस ले लो।  ऐसे ही दुगुना होते जब राशि ज्यादा हो गयी तो ब्राम्हण ने कहा की हम घर पर ले लेंगे।
अब बनिया और चकित हुआ ये शंख तो उस शंखी से ज्यादा कीमती था. बिना देरी किये शंख बदल डाली शंखी से .
अब ब्राम्हण के पास असली शंखी आ गयी थी , और बनिए के पास बड़ा शंख। बनिया लालच बस अपने पत्नी से बोला आज मैं भी सांध्य पूजा करूँगा।  बनिया पूजा कर के पैसे की याचना करता है , और शंख उसे दुगुना देने की लालच देते जाता है . धन की राशि कुछ ज्यादा हो गयी तो बनिया गुसे में बोल मुझे पैसे दे दो अब मुझे और नहीं चाहिए।
फिर शंख ने संस्कृत में कुछ इसप्रकार कहा


"पर हस्ते गदा शंखी पञ्चरूप्यकदयनी, अहम डपोर शंखोस्मि बदामी न ददामि च  "
पांच रुपये देने वाली शंखी दूसरे के हाथ में चली गयी है , मैं डपोर शंख हूँ सिर्फ बोलूंगा दूंगा कुछ नहीं..

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