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बुधवार, 28 दिसंबर 2016

पालतू कबूतर और धूर्त शिकारी - paltu kabutar aur dhurt shikari

एक शिकारी जंगल से कबूतर पकड़ कर लाता है। उसे अपने घर पर पिंजड़े में रखता है। कबूतर धीरे धीरे पालतू बनते जाता है। शिकारी कबूतर को काजू बादाम खिलता है। कबूतर मोटा तगड़ा हो जाता है। कबूतर शिकारी के यहाँ अपने को बहुत सुखी समझता है। कबूतर जंगल में अपने पुराने मित्रों और परिवार को भूल जाता है। कबूतर शिकारी को अपना सर्वस्व समझने लगता है।


एक दिन शिकारी कबूतर को जंगल में ले जाता है। शिकारी जाल बिछाता है और उस जाल के बगल में कबूतर को पिंजड़े सहित रख देता है। अब शिकारी पास के झाडी में जाकर छुप जाता है। शिकारी वहीँ से आवाज लगता है "बोलो बेटा"। कबूतर शिकारी की आवाज सुन जोर जोर से बोलने लगता है। कबूतर की आवाज सुनकर पास के पेड़ पर बैठे कबूतर सोंचते हैं ये कबूतर मुसीबत में है इसे बचने का प्रयास करना चाहिए। ये सोचकर कुछ कबूतर पेड़ पर से उतरकर पिजड़े में बंद पालतू कबूतर के पास आते हैं और वहां बिछाए गए जाल में फँस जाते हैं।
अब धूर्त शिकारी आता है एक एक कर सभी कबूतरों को पकड़ लेता है। शिकारी सभी कबूतरों को भर ले कर आता है। अब शिकारी पालतू कबूतर को पिंजड़े में तंग देता है। फिर इस पालतू कबूतर के सामने सभी कबूतरों को एक एक कर काटता है। पिंजड़े में बंद कबूतर इन कबूतरों को काटते देख कुछ नहीं करता है

आज हमारे देश में हिंदुओं का हाल भी कुछ ऐसे ही है। हिन्दू धर्म विरोधीं शिकारियों ने(नेताओं ने ) हिंदुओं में से बहुत से पालतू कबूतर पाल रखे हैं जो अपने सगे भाईओं को काटते देखते हैं और खामोस रहते हैं सिर्फ इसलिए की उनको उनके हिस्से का काजू बादाम मिल रहा है। यही हाल रहा तो कबूतरों("हिंदुओं") का अस्तित्व मिटना निश्चित है 

शनिवार, 24 दिसंबर 2016

आप दूसरे के बारे में भला सोचोंगे तो वो भी आपका भला सोचेंगे

Think Positive About Someone He Will Think Positive Too


विद्वानों  का मत है की अगर आप दूसरे के बारे में भला सोचोंगे तो वो भी आपका भला सोचेंगा। चन्दन का एक व्यापारी था। चन्दन के लकड़ियों का उसका  व्यवसाय बहुत अच्छा चल रहा था। उसने व्यापार के समृद्धि के लिए बहुत सी चन्दन लकड़ियां इकठ्ठा कर रखी  थी ताकि बाजार में बढ़ते मांग को पूरा किया जा सके। फिर बाजार में मंदी  आने से उसका व्यवसाय बिल्कुल  मंद पड़  गया। वह अपने व्यवसाय के प्रति चिंतित रहने लगा।
एक दिन राजा के यहाँ से उसका बुलावा आया। चन्दन का व्यवसायी राजा के दरबार में प्रस्तुत हुआ। व्यापारी अपने व्यवसाय से चिंतित था। राजा को देखकर उसने सोंचा ! अगर राजा की मृत्यु हो जाती है तो इनके अंतिम संस्कार के लिए मेरी चन्दन की लकड़िया बिक जाएंगी। राजा ने भी व्यापारी के तरफ ललचायी हुई नज़रों से देखा। राजा ने सोंचे इस धनी व्यापारी ने चन्दन की लकड़ियां बेचकर बहुत से पैसे कमाएं हैं। इसपर मैं यदि भारी कर लगता हूँ तो मुझे बहुत बड़ा राजस्व लाभ होगा। राजा ने व्यवसायी के प्रति ये भाव रखा और कुछ देर बातचीत के बाद उसे अतिथि विश्राम गृह में जाने को कहा। उसके पश्चात व्यवसायी अपने घर चला गया।

हमारे शरीर के अंदर जैसे भाव आते हैं हमारे आभामंडल उस अनुरूप हो जाते हैं। आभामंडल प्रत्येक व्यक्ति के शरीर के चारो तरफ एक सूक्ष्म घेरा होता है। ये आभामंडल हमारे सोच और विचार को भी प्रभावित करते हैं।
राजा भी शारीरिक संकट से जूझ रहे थे। राज पंडितों ने राजा की कुंडली देखकर कहा की महाराज आप को अच्छे स्वास्थ्य के लिए एक यज्ञ करना पड़ेगा। इस यज्ञ के लिए चन्दन की लकड़ियां और बाकी यज्ञ सामग्री तैयार करने की आज्ञा दें। यज्ञ लंबा चलना था और इसके लिए रोज चन्दन की लकड़ी चाहिए थी। 

राजा ने चन्दन की लकड़ी के लिए अपने सेवकों  को चन्दन के उसी व्यापारी के पास भेज दिया।  उन्होंने अपने सेवकों से चन्दन के व्यापारी को राजदरबार में उपस्थित होने के लिए बुला भेजा। राजा अभी अभी इस व्यापारी पर अधिक टैक्स लगाने वाले थे। लेकिन यज्ञ के लिए चन्दन की लकड़ी चाहिए थे अतः उन्होंने अपने इस फैसले को स्थगित कर दिया। राजा के सेवकों ने चंदन के व्यापारी को  राजा के यहाँ होने वाले यज्ञ के बारे में बताया। साथ ही यह भी बताया की यज्ञ लंबा चलेगा और राजा को यज्ञ के लिए महीनो शुद्ध चन्दन की लकड़ी चाहिए।

बनिए के अंदर राजा के प्रति भावना बदल गयी थी। पहले वो राजा की मृत्यु का अशुभ मना  रहा था ताकि राज  के अंतिम संस्कार के लिए उसकी चन्दन की लकड़िया बिक जाएँ। लेकिन अब वह राजा के दीर्घ जीवन की कामना करने लगा था जिससे उसकी चन्दन की लकड़िया और ज्यादा बिक सकें। इसी भाव से वह राजा के समक्ष प्रस्तुत हुआ। राजा के प्रति व्यापारी के अपने विचार बदलने से राजा भी व्यापारी के प्रति सही भाव रखने लगे थे। उन्होंने बनिए का बहुत बढ़िया आदर सत्कार किया तथा चन्दन के व्यापर पर अधिक कर लगाने की जो बात उन्होंने सोच राखी थी उसे अपने मन से निकाल दिया। राजा ने सोचा की वनिया धार्मिक कार्यों के लिए चन्दन की लकड़ी बेचता है। अगर यह अधिक कर से परेशान होगा तो हमारे राज्य में धार्मिक कार्य लोग रूचि लेकर नहीं करेंगे। धर्म में रूचि नहीं लेने से धर्म की हानि होगी, और हमारे राज्य में धर्म की हानि होने का मतलब है मेरी यानी राजा की हानि।

शनिवार, 17 दिसंबर 2016

टोपी विक्रेता और बंदर

एक टोपी विक्रेता था । वह गावँ शहर घूम घूम कर टोपी बेचा करता था । एक दिन वह अपने व्यापर के लिए एक गावँ में घूमकर खूब फेरी लगाया । सुबह से दोपहर हो गयी एक भी टोपी नहीं बिकी । दिन ढलने पर वह शहर की ओर जाने लगा । रास्ते में एक पेड़ की घनी छाव दिखी। उसने अपने साईकिल को पेड़ से लगाया तथा प्रचार के लिये जो टोपी पहन रखा था वही पहने सो गया ।


थके हुए टोपी विक्रेता को पेड़ की ठंढी छावं में शीघ्र ही नींद लग गयी । उस पेड़ पर कुछ बन्दर बैठे थे । बंदरों ने उस टोपी विक्रेता की तरफ बड़े गौर से देखा । फिर पेड़ पर से एक बन्दर उतरा और साईकिल की हैंडल पर रखी टोपी को उतारकर पहन लिया और पेड़ पर जा बैठा । अब उस बन्दर की देखा देखी एक एक कर सभी बन्दर उतरते और टोकरी में झलक रही टोपियों में से एक निकालते और पहन कर पेड़ पर बैठ जाते । इस तरह टोपी विक्रेता की टोकरी खाली पड़ गयी। पेड़ पर एक बन्दर बिना टोपी के रह गया था । वह बन्दर भी नीचे उतरा और फेरीवाले विक्रेता के सिर से टोपी उतार कर पहन लिया और पेड़ पर बैठ गया।

कुछ देर बाद फेरीवाला जब सर खुजलाते उठा तो उसे महसूस हुआ की उसके सर पर टोपी नहीं है। उसने साईकिल पर रखी अपनी टोपियों की तरफ देखा तो झोली खाली थी। वह अत्यंत चिंतित हुआ इधर उधर देखते हुए उसकी दृष्टि पेड़ पर बैठे बंदरों पर पड़ी विक्रेता स्तब्ध रह गया। वह लाचार था बंदरों से टोपी ले लेना किसी भी प्रकार से सम्भव नहीं था।

वह निराश होकर वहां से जाने की तैयारी करने लगा। तभी वहाँ से एक बुजुर्ग़ व्यक्ति गुजर रहे थे।  उन्होंने टोपी पहन रख थी। पेड़ पर टोपी पहने बैठे बंदरों को देख कर उन्हें हंसी आयी। वो उस टोपी विक्रेता के पास जाकर इसका रहस्य जानना चाहे। टोपी बेचने वाले ने उन्हें बताया की ये सभी बन्दर मेरे टोकरी से टोपी निकाल निकाल पहन लिए हैं जब मई सो रहा था। और तो और इन बंदरों ने मेरे सिर पर से भी टोपी उतार रखी है।

बुजुर्ग व्यक्ति समस्या को ठीक से समझ गए और उन्हें इसका समाधान भी सूझ गया। उन्होंने बंदरों के करीब जाकर अपने सिर से टोपी उतार कर फेंकने का नाटक किया। देखा देखी सभी बंदरों ने अपनी अपनी सर से टोपी उतार कर फ़ेंक दिया। अब टोपी बेंचने वाला बनिया एक एक टोपी इकठ्ठा किया और अपनी टोकरी में रख लिया। इस तरह उस बुजुर्ग व्यक्ति की चतुराई से टोपी विक्रेता की सारी टोपियां वापस मिल गयीं। 

बुधवार, 14 दिसंबर 2016

व्यवसाय के लिए धन मूल आवश्यकता नहीं - Funding is not a fundamental requirement for business

व्यवसाय के  लिए धन मूल आवश्यकता नहीं। किसी भी व्यवसाय के लिए धन की आवश्यकता  होती है लेकिन धन से भी जरुरी है  व्यवसायिक बुद्धि। 

दो व्यवसायी आपस में बात कर रहे थे। पहले व्यवसायी का व्यापर सही चल रहा था दूसरे के पास काफी आर्थिक तंगी थी वाणिज्य में घाटे से उसके पास नए व्यवसाय के लिए पैसे नहीं थे। वह अपने मित्र से यही दुःख बार बार रो रहा था। पहला व्यापारी जो धनि था उसे व्यवसाय का अनुभव था। वह अपने मित्र से बार बार यही कहता वाणिज्य के लिए धन का होना कोई जरूरी नहीं उसके लिए तो व्यावसायिक बुद्धि ही पर्याप्त है।
निर्धनता से दुखी दूसरे मित्र को ये बात काफी अटपटी लगी वह झुंझला कर बोला। मित्र तुम कैसी अटपटी बात कर रहे हो भला बिना पैसे के रोजगार कैसे हो सकता है क्यों मेरे निर्धनता का उपहास  कर रहे हो। पहले मित्र ने उसे समझते हुए कहा मैं सच कह रहा हूँ। ये जो तुम्हारे बगल में चूहा मरा पड़ा  है न तुम इससे भी व्यवसाय कर सकते हो। 


दूसरे मित्र ने वह मृत चूहा उठाया और साप्ताहिक बाजार की ओर दोनों चल पड़े। बाजार में एक बनिया पालतू जानवर कुत्ते बिल्ली बेचता था। उसके जानवरो को खाने के लिए कुछ नहीं मिल रहा था। उसने दूसरे बनिए के हाथ में चूहा देखा तो अपने बिल्ली के लिए खरीद लिए। 

इस प्रकार मृत चूहे से मिले पैसे से बनिए ने चना खरीद कर बेचना शुरू किया। थोड़ा सा चना बेचने से जो मुनाफा हुआ उससे वह फिर और ज्यादा चना ख़रीदकर बेचना शुरू किया। इस तरह उसका मुनाफा बढ़ता गया और वो अपना व्यवसाय भी बढ़ता गया।

इस तरह एक मृत चूहे के मुनाफे से वह एक धनी  व्यवसायी बन गया।

गुरुवार, 8 दिसंबर 2016

किसी को सही से समझने के लिए लंबा समय देना पड़ता है

एक बुद्धिमान बनिया के चार पुत्र थे। वह अपने पुत्रों को शिक्षा दे रहा था। बनिए ने अपने पुत्रों को एक दिन समझते हुए कहा की किसी भी चीज़ के बारे में हमें सही जानकारी लेने के लिए उसे लंबे समय तक देखना पड़ता है। तभी हम उसके प्रकृति और स्वभाव  के बारे में सही जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

वणिक पुत्रों को पिता के बात पर विश्वास नहीं हुआ। एक पुत्र ने कहा की पिताजी किसी बस्तु को हम देख के कुछ छड़ों में ही इसके बारे में बता सकते है इसमें इतन समय व्यर्थ करने की क्या जरुरत है। उसके बात से बाकी दोनों भाइयों ने सहमति दिखाई। उन तीनो लड़कों ने एक साथ कहा पिता जी हम अपने दूकान में रखी बस्तु को तो शीघ्र ही पहचान जाते हैं फिर आप ऐसा क्यों बोल रहे हैं।

फिर उस वणिक ने चार चार महीने के अंतराल पर अपने सभी पुत्रों को संतरे के पेड़ खोजने के लिए भेजा। उसने कहा की अपने बाग़ में संतरे का पेड़ नहीं है हम चाहते हैं की अपने बाग़ में भी संतरे के पेड़ हो

पिता की आज्ञा पाकर पहला पुत्र पेड़ की तलाश में चल पड़ा। लोगो से पूछते हुए वह संतरे के पेड़ के पास पहुँचा। उसने संतरे के पेड़ को देखा वह टेढ़ा मेढा  और सुख हुआ था। सूखे पेड़ को देखकर वह उसे छोड़ कर चला गया उसने ऐसे पेड़ के पौधे ले जाने उचित नहीं समझा।

कुछ दिन बाद यानि चार महीने के अंतराल पर सेठ ने अपने दूसरे पुत्र को संतरे के पेड़ ढूढने और उसके पौधे लाने के लिए कहा। ढूढते ढूढते वह एक फलों के पौधों के नर्सरी में पहुँचा। पेड़ तो हरे भरे थे लेकिन उसमे फल नहीं लगा हुआ था अन्यमनस्क होकर वह उस पेड़ के पौधे अपने बगीचे में लगाने के लिए ले लिया।

अब ४ महीने बाद तीसरे पुत्र को पौधे के तलाश में भेजा गया। पौधे के तलाश में जब वह संतरे के पेड़ के पास पहुंच तो वहां जाकर उसने सुन्दर फलों से लदे संतरे के पेड़ को देखा। पेड़ देखकर बहुत खुस हुआ और उसका पौधा अपने साथ ले लिए

अब बनिए ने अपने सभी पुत्रों को बुलाया
पहला पुत्र पिताजी संतरे का पेड़  तो बिलकुल टेढ़ा मेढा और सुख था इसलिए मैंने उसके पौधे भी साथ नहीं लाया
दूसरे पुत्र ने उसे रोकते हुए कहा नहीं नहीं वो तो बिलकुल हरा भरा था लेकिन उसपर फल नहीं थे फिर भी आपकी आज्ञा से मैं वह पौधा ले कर आया हूँ

तीसरे पुत्र ने दूसरे के बात को काटते  कहा नहीं भैया उसपर फल भी लगे थे मैं सुन्दर फल भी लाया हूँ और पेड़ लगाने के लिए पौधे भी। तीसरे लड़के ने फल और पौधे दिखाते हुए ये बात कहा  .,

बनिये ने अपने पुत्रों से पूछा ? तीनो ने उत्तर दिया तीनो को सार समझ में आ गया था।

शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

मक्खीचूस बनिए की कहानी

मक्खीचूस बनिया की कहानी
एक बनिया था। उसका तेल और घी का व्यवसाय था। अपने ग्राहकों को सामान देते समय वो इस बात का ख्याल रखता था कि कही तौल में किसी ग्राहक को ज्यादा सामान तो न दे दिया। उसकी कंजूसी का उसके परिवार वालों तथा नौकर चक्रों को भी पता था।



सुबह उठ कर वह अपने दूकान पर जाता था। दुकान जाते समय वह अपने कुर्ते को कंधे पर रख लेता था और अपने जूते हाथ में ले लेता था। जब जब दूकान नजदीक आता था तो कंधे से कुर्ता उतार कर पहन लेता था, और पैरों से धूल झाड़कर जूते भी पहन लेता था। उसका ऐसा मानना था कि ऐसा करने से उसके कपडे तथा जूते ज्यादा दिन तक चलेंगे।

एक बार साहूकार ने गावँ के ग्वाले से घी खरीदी। सुबह वह घी ले कर अपने दूकान जाने लगा। रास्ते में उसे ख्याल आया की अरे पंखा तो चलता छोड़ आया हूँ अगर वापस जाकर पंखा ऑफ नहीं करता हूँ तो कितने की बिजली बर्बाद हो जायेगी। कंजूस बनिया कंधे पर कुर्ता, एक हाथ में जूते तथा दूसरे हाथ में घी के बर्तन लिए घर की ओर वापस चल पड़ा।  घर पहुंचकर सेठ ने दरवाजा खटखटाया। अंदर से नौकर ने आवाज लगायी कौन है ? सेठ जी बोले मैं हूँ दरवाजा खोलो। नौकर ने कहा सेठ जी आप वापस क्यों आ गए ? बनिए ने कहा मेरे कमरे का पंखा  अभी भी चल रहा है उसे बंद करना है, तुम दरवाजा खोलो। सेठ से बार बार दरवाजा खोलने से इसके कब्जे घिस जाएंगे वैसे मैंने पंखे बंद कर दिए हैं नौकर ने कहा। कंजूस बनिए को नौकर की ये बात अच्छी  लगी।
बनिया अपने एक हाथ में घी का बर्तन दूसरे हाथ में जूता लिया हुए दूकान पर लौट पड़ा।

मार्ग में वह एक जगह पर विराम किया। उसका मन किया की घी देखूं शुद्ध है की नहीं इसमें देशी घी का सुगंध आता है या नहीं। अतः उसने घी के बर्तन पर से ढक्कन उठाया। जैसे ही वह ढक्कन खोल एक मक्खी घी में पद गयी। बनिए को मक्खी के इस घृष्टता पर बहुत गुस्सा आया। वह मक्खी को घी के बर्तन में से निकल कर उँगलियों से निचोड़ कर सारा घी निकल लिया जमीन  पर उसे फ़ेंक दिया। .कंजूस बनिए को फिर भी संतोष नहीं हुआ उसे लग रहा था कि  मक्खी के शरीर में अब भी घी शेष रह गया है। उसने मक्खी के शरीर से बचा खुचा  घी निकालने का तरकीब सोचा। मक्खी को जमीन पर से उठाया और अपने मुह में रखकर सूचने लगा। तब से कंजूसों के लिए मक्खीचूस शब्द का प्रयोग होने लगा। आज भी जब कोई आदमी कंजूसी की सीमा को पर कर जाता है तो लोग उसे मक्खीचूस की संज्ञा देते हैं।

आपको इस मक्खीचूस बनिए की कहानी से क्या शिक्षा मिली कमेंट बॉक्स में कहानी का सारांश सुझाएँ ?

शनिवार, 19 नवंबर 2016

हमेशा एक बुद्धिमान व्यक्ति द्वारा सलाह लें

Always Take Advice By a Wise Man

एक कुम्हार था।  वह मिटटी के बर्तन बनाकर बेचा करता था. कुम्हार की पत्नी हमेसा उसे कोशते रहती थी। वह चाहती थी की कुम्हार ज्यादा काम करे जिससे परिवार में पैसा आये। वह कुम्हार को हमेशा दिमाग लगाकर सुन्दर कलाकृति से युक्त बर्तन बनाने को बोलते रहती थी।  लेकिन कुम्हकार जितना दिमाग लगा सकता था उसी हिसाब से साधारण बर्तन बनाया करता था।

वही दूसरे कुम्हार सुन्दर कलाकृति वाले बर्तन बना कर खूब पैसे काम रहे थे। ज्यादा पैसा होने से उनका जीवन स्तर अच्छा था। कुम्हार की पत्नी अपने सहेलियों में पहनावा और वेशभूषा से खुद को हीन समझती थी। इस हीन भावना के निवारण का एक ही उपाय था की कुम्हार भी सुन्दर बर्तन  बनाने लगे जिससे ज्यादा पैसा बन सके। 

कुम्हार भी अपने इस व्यवहार से दुखी था लेकिन मजबूर था वह दूसरे कुम्हारों की तरह कल्पनाशील नहीं था जिससे दिमाग का उपयोग कर रचनात्मक बर्तन बना सके। एक दिन कुम्हार बर्तन बनाने के लिए मिटटी लाने खेतों में गया था। खेत से मिटटी इकठ्ठा करते समय वह रोने लगा और धरती माँ से विनती करने लगा।  हे माँ!  तूने मुझे इतना मंद मति का क्यों बनाया जिससे मैं सुन्दर बर्तन बनाने में असमर्थ हूँ ? वह कार्य करते हुए धरती माँ को याद कर रोता रहा।

उसकी विनती सुन पृथ्वी को दया आ गयी। पृथ्वी एक स्त्री के रूप में कुम्हार के समक्ष प्रकट हुईं। देवी ने कुम्हार से पूछा बोलो वत्स क्यों परेशान हों मैं  तुम्हारी किस प्रकार सहायता कर सकती हूँ जिससे तुम्हारा दुःख दूर हो। कुम्हार कुछ बोल नहीं पाया। देवी ने कुम्हार को वचन दिया की तुम मुझसे कोई भी दो वरदान मांग सकते हो।
कुम्हार ने सोचा मैं तो ठहरा मतिमंद चल के अपनी पत्नी से पूछ आता हूँ, की क्या मांगना सही रहेगा। कुम्हार भागता भागता घर पहुंचा। कुम्हार की पत्नी जब कुम्हार को खाली हाथ बिना मिटटी के आये देखी तो झुंझला गयी। फिर कुम्हार ने वरदान वाली बात पत्नी को बताई।

कुम्हार पर क्रोधित पत्नी ने कुम्हार को ज्यादा दिमाग और हुनर के लिए दो सिर तथा ज्यादा काम करने के लिए दो हाथ मांगने का सलाह दिया।


पत्नी की सलाह लेकर कुम्हार खेतों की तरफ जल्दी से भाग चला। धरती के वरदान से उसे दो सर और चार हाथ हो गए। जल्दी जल्दी गधे पर सारा मिटटी लड़कर वह गावँ की ओर चल पड़ा। कुम्हार इतना खुश था की गधे के पीछे पीछे चलने वाला व्यक्ति आज गधे से काफी आगे आगे चल रहा था। कुम्हार को जल्दी घर जाकर पत्नी से अपनी सूरत और उपलब्धि जतानी थी।

गावँ की लोगों ने जब गावँ की तरफ दो सिर और चार हाथ वाले पुरुष को आते देखा तो वो लोग डर गए। गावँ वालों ने समझा की जरूर ये कोई राक्षस है। सभी ने अपने अपने हथियार निकाल लिए और एक साथ सभी गावँ वाले उसपर हमला बोल दिए। हमला  इतना अचानक था की कुम्हार संभल भी  नहीं पाया और सभी लोग उसे पीट पीट कर अधमरा बना दिए। कुम्हार के पत्नी से सुना की गाँव में राक्षस आया है तो वह भी उसे देखने पहुँच गयी। कुम्हार की पत्नी ने उसे और पीटने और मरने से बचाया। उसकी पत्नी अपने दिए परामर्श पर बहुत पश्चाताप कर रही थी।

इसीलिए कहा गया है=>कभी भी कोई परामर्श बुद्धिमान और सज्जन व्यक्ति से लेनी चाहिए।     

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रविवार, 13 नवंबर 2016

हजारों साल चलने वाला पंखा

      हजारों साल चलने वाला पंखा....एक बार एक धूर्त पंखा बिक्रेता नगर मे घुम घुमकर पंखा बेच रहा था। पहले के जमाने मे यातायात के साधन कम थे । बिक्रेता पैदल ही घुम घमकर फेरी लगाकर समान बेचते थे ।
धुर्त बिक्रेता अवाज लगा रहा था । पंखा ले लो हजारों साल चलने वाला पंखा जन्म जन्मान्तर तक चलने वाला पंखा । नगर के सभी लोग  आश्चर्य से पंखा बिक्रेता की ओर देख रहे थे लेकिन किसी को उससे पंखा खरीदने की हिम्मत नही हो रही थी।


पंखा बिक्रेता अवाज लगाते हुए राजा के महल के समीप पहुचा । पंखा बिक्रेता आवाज लगा रहा था ......हजारों साल चलने वाला पंखा।
राजा ने उसकी आवा ज सुनी और दरबारि यों से बुलाने को कहा। दरबारी पंखे वाले को राजा के समक्ष प्रस्तुत किये । राजा ने पंखा बिक्रेता से पुछा कहो कैसा पंखा बेच रहे हो .....बनिये ने राजा को पंखा दिखाया। राजा ने पुछा क्या यह पंखा सच मे हजार साल चलने वाला है । बनिये ने कहा हा महाराज! राजा ने कुतु हल बस पंखा खरीद लिया । राजा के सेवक राजा को पंखा झलने लगे । राजा के सेवकों मे इस नये पंखे को झलने की होड लग गयी । राजा ने सेवकों का मन रखने के लिए सभी सेवकों को अवसर दिया । 
अपनी अपनी बारी आने पर सभी सेवक राजा को पंख झलते। सेवक दिर्घजीवी पंखा  को देखकर काफी उत्साहित थे पंख टूटने का दर नहीं थे अतः सभी अपने अपने अंदाज से राजा को खुश करने के लिए पंखे झलते। सेवकों के इसी अंदाज से हजारों साल तक चलने वाला पंखा कुछ ही घंटे में टूट गया। 

राजा ने पंखा टुटा देखा तो राजा को पंख बिक्रेता पर बहुत गुस्सा आया।  उसने अपने सैनिकों को आदेश दिया  की जल्द से जल्द उस कपटी बनिए को मेरे समक्ष प्रस्तुत करों। पंखा बिक्रेता उसी नगर में फेरी लगा रहा था। राजा के सैनिक जल्द ही उसे पकड़कर राजा के सामने पेश किये। 

राजा ने प्रश्न किये ? कहो कपटी वणिक तुम मेरे राज्य के भोले भाले नागरिकों को क्यों ठग रहे हो। क्यों तुम्हारा हजारों साल तक चलने वाला पंखा कुछ ही घंटे में टूट गया। बोलो तुम्हारे साथ क्या न्याय किया जाए। 
पंखा बिक्रेता ने राजा से बड़ी सहजता से पूछा -> महाराज इस पंखे को किस प्रकार झाला जा रहा था ? राजा ने कहा ये भी कोई पूछने की बात है पंखे जैसे झले जाते हैं वैसे ही इसे भी झाला गया। सभी पंखे झलने की एक ही विधि है। 
इसपर बनिए ने कहा नहीं महाराज मैंने इस पंखे के साथ इसकी एक उपयोग विधि भी दी थी। लाईये वो पर्ची दीजिये मैं इस पंखे की उपयोग विधि बताता हूँ। राजा के सेवकों ने कहा वो तो हमने पढ़ी नहीं फ़ेंक दी। ढूंढने पर किंनारे फर्श पर गिरी पर्ची मिल गयी। पंखा बिक्रेता पर्ची खोला  और पंखा  झलनेकी विधि पढ़ कर बताने लगा। 
पर्ची पर लिखे निर्देश के अनुसार पंखे को अपने नाक के सामने रखकर अपने सिर को हिलाना था। 

राजा पंखा बेचने वाले के तर्क को सुनकर बहुत हंसे  और प्रसन्न होकर उसका अपराध  क्षमा कर दिया .

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सोमवार, 31 अक्तूबर 2016

राजू नाम का लड़का और धनी सेठ

राजू नाम लड़का एक धनी सेठ के यह काम करता था। लड़का बहुत मातृ भक्त था। वह अपने माँ से पूछ कर ही सब काम करता था। वह किसी बात के निर्णय के लिए अपने बुद्धि का प्रयोग नहीं करता था। अर्थात  उसमे प्रतिउत्पन्न मतित्व की कमी थी।

एक बार सेठ ने लड़के को मजदूरी में पैसे दिए। राजू पैसे हाथ में लिए सिक्कों को उछालते हुए घर पहुँचा। उछालने से बहुत से सिक्के रास्त में खो गए।  बच्चे खुचे सिक्कों के साथ घर पहुँचा तो माँ ने राजू से उदासी का कारन पूछा।  राजू ने बताया की सेठ ने मुझे दस सिक्के दिए थे लेकिन कुछ सिक्के रास्ते में गिर गए। माँ ने उसे समझते हुए कहा कोई बात नहीं बेटा अब सेठ कोई भी चीज दे तो उसे जेब में रख कर लाना।
कुछ दिन बाद सेठ की गाय ने बछड़े को जन्म दिया। सेठ ने राजू को कहा की आज तुम गाय का दूध लेते जाना। राजू ने माँ के कहे अनुसार दूध जेब में रख लिया। जेब में दूध रखने से सारा दूध निचे गिर गया। उदास होकर राजू जब घर पहुँचा तो माँ ने उसे समझते हुए कहा कोई बात नहीं बेटा अब से तुम जो कोई सामान लाना बाल्टी में लाना। मैं तुम्हे ये बाल्टी देती हूँ इसे अपने साथ ले जाना सेठ जब भी कोई सामान दे इसमें रख लेना।

राजू के सेठ के यहाँ मुर्गा बहुत हो गए थे।  सेठ ने सोचा क्यों न राजू को एक मुर्गा दे दूँ। सेठ ने राजू से कहा राजू शाम को जाते समय एक मुर्गा लेते जाना। राजू मुर्गा पाकर बहुत खुश  हुआ वह मुर्गे को अपने बाल्टी में रख कर अपने घर चला। कुछ दूर जाने के बाद मुर्गा बाल्टी में से उड़कर पेड़ पर बैठ गया। राजू चाहकर भी मुर्गे को नहीं पकड़ सका। उदास राजू खाली हाथ घर लौट गया।

इस कहानी का सारांश यह है की हमें समयानुसार अपने दिमाग से निर्णय लेना चाहिए।        

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ईमानदारी सर्वोत्तम नीति है, बेईमान ग्वाला

एक दूधवाला बेईमानी का सहारा लेकर बहुत अमीर बन गया। उसे शहर जाने के लिए रोज रास्ते में एक नदी  पार करनी पड़ती थी। शहर में उसके ग्राहक रहते थे और वह रोज शहर जाकर अपने ग्राहकों को दूध देता था। नदी पार करने के लिए वह रोज अपने दूध के बर्तन के साथ नाव पर बैठ जाता था। नदी पार करते हुए वह दूध के बर्तन का मुह खोल कर दूध में पानी मिला लेता था। लाभ कमाने के लिए वह रोज इसी तरह दूध में पानी मिला देता था और ऐसा करके वह अच्छा लाभ कमाने लगा। एक दिन वह अपने बेटे के शादी का जश्न मानाने के लिए ग्राहकों से देय राशि वसूलने के लिए वह शहर गया।

इस प्रकार एकत्र बड़ी राशि से , वह सुन्दर कपड़े और शानदार सोने के गहने खरीदा।  अपने घर जाते समय जब वह नदी पर कर रहा था थो नाव नदी में डूब गयी। दूधवाला तैरना जनता था वह तैर कर नदी के किनारे पहुँच गया लेकिन उसके सभी कीमती कपडे नदी के तेज धार में बह गए। शानदार चमकते सोने के गहने नदी में डूब गए और वह चाह कर भी उन्हें नहीं बचा सका। दूध विक्रेता के दु:ख से अवाक था। उस समय वह नदी से एक आवाज सुना, "मत रोवो जो तुमने खोया है वह तुम्हारे ग्राहकों से अवैध रूप से कमाया हुआ लाभ ही है" तुम रोज अपने ग्राहकों के दूध में लाभ के लिए पानी मिलाया करते थे। आज पानी का पैसा पानी में मिल गया है इससे तुम दुखी क्यों हो रहे हो।  

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सोमवार, 24 अक्तूबर 2016

धनतेरस की कहानी - धनत्रयोदशी २०१६ २८ अक्टूबर शुक्रवार


धनतेरस धनत्रयोदशी पांच दिन तक चलने वाले दिवाली उत्सव का पहला दिन है। इस त्यौहार को धनत्रयोदशी या धनवन्तरि त्रयोदशी के नाम से जाना जाता है। यह हिन्दू पंचांग( "calender") के कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष के त्रयोदशी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष (२०१६) को धनतेरस  का त्यौहार २८ अक्टूबर दिन शुक्रवार  को है।

धनतेरस के अवसर पर धनवन्तरि की पूजा की जाती है।  धनवंतरी को सभी चिकित्सकों का शिक्षक और आयुर्वेद का प्रवर्तक माना जाता है।

इस उत्सव की विशेषता ->

धनतेरस धन के साथ जुड़ गया है और लोग इस दिन सोने या चांदी के गहने और बर्तन आदि खरीदते है,  हालांकि धनवन्तरि का धन और सोने का साथ कोई सम्बन्ध नहीं है। धन्वंतरी धन के बजाय एक अच्छे स्वास्थ्य के प्रदाता है। 

धनतेरस से सम्बंधित कहानी 
धनतेरस  की कहानी

इस बारे में एक प्राचीन कथा में राजा हिमा के 16 वर्षीय बेटे के एक दिलचस्प कहानी  का वर्णन है। उसकी कुंडली ने शादी के चौथे दिन सांप के काटने से उसकी मौत की भविष्यवाणी की। उस विशेष दिन पर, उसकी नवविवाहिता  पत्नी ने उसे सोने के लिए अनुमति नहीं दी। एक ढेर में वह अपने सारे गहने और सोने और चांदी के सिक्कों को शयन कक्ष के बहार रख दी और सभी जगह पर दीपक जला दीया। फिर वह अपने पति को जगाये रखने के लिए पूरी रात कहानिया सुनाई और गीत गाती रही। जब मृत्यु के देवता यम एक नागिन की भेष में राजकुमार के दरवाजे पर पहुंचे, उनकी आँखें  लैंप और आभूषण की चमक से अंधी हो गयी। यम राजकुमार के कक्ष में प्रवेश नहीं कर सके, तो वह सोने के सिक्कों की ढेर के शीर्ष पर चढ़ गए। यमराज साँप के रूप में पूरी रात वहाँ बैठे कहानियों और गीतों को सुनते रहे, और सुबह होने पर , वह चुपचाप चले गए। इस प्रकार, युवा राजकुमार अपनी नई दुल्हन की चतुराई से मौत के चंगुल से बच पाया था। तब से यह दिन धनतेरस के रूप में मनाया जाने लगा। इससे अगला दिन नरक चतुर्थी के रूप में मनाया जाता है। यह दिन यमदिपोदान के रूप में मनाया जाता है, घर की महिलाएं मिटटी के दिए जलती हैं, और यह दिया मृत्यु के देवता यम को प्रसन्न करने के लिए पूरी रात जलता रहता है। चुकी यह दिवाली से एक दिन पहले  मनाया जाता है अतः इसे छोटी दिवाली भी कहा जाता है  


एक अन्य लोकप्रिय पौराणिक कथा के अनुसार , जब देवताओं और राक्षसों ने मिलकर अमृत के लिए समुद्र मंथन किया तो, धनवंतरी (देवताओं के चिकित्सक और विष्णु  के अंश अवतार) धनतेरस के दिन अमृत का घड़ा ले प्रकट हुए।
धनतेरस की तैयारी
धनतेरस के दिन, व्यावसायिक परिसर का जीर्णोद्धार किया जाता है और सजाया जाता है। धन और समृद्धि की देवी के स्वागत के लिए प्रवेश द्वार को लालटेन और रंगोली डिजाइन के पारंपरिक रूपांकनों के साथ रंगीन बनाया जा ता है। देवी लक्ष्मी के लंबे समय से प्रतीक्षित आगमन का संकेत करने के लिए, छोटे पैरों के निशान, चावल का आटा और सिंदूर पाउडर से सभी घरों पर अंकित किया जाता है। पूरी रात दीपक जलाये जाते हैं।  



उत्सव समारोह
धनतेरस का त्यौहार श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। संध्या को लक्ष्मी पूजा होती है और अंधकार तथा बुरी आत्माओं को दूर भागने के लिए  मिटटी के दिए जलाये जाते हैं। देवी लक्ष्मी की प्रशंसा में भक्ति गीत और भजन गाया जाता है। देवी को पारंपरिक मिठाइयों का "नैवेघ अर्पण" किया जाता है। महाराष्ट्र में हल्के से सूखा धनिया बीज( मराठी में धनत्रयोदशी के लिए धन)  और गुड़ को नैवेद्य के रूप में अर्पण करने की एक अद्भुत प्रथा है।


गांवों में मवेशियों  को सजाया जाता है और किसानों द्वारा उनकी पूजा की जाती है, क्योंकि वे उनकी आय का मुख्य स्रोत के रूप माने जाते हैं ।

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गुरुवार, 20 अक्तूबर 2016

प्रतिक्रिया जीवन की कसौटी - प्रतिक्रिया में व्यक्तिगत भिन्नता

प्रतिक्रिया जीवन की कसौटी
प्रतिक्रिया जीवन की कसौटी है। एक ही बात का विभिन्न व्यक्तियों पर पात्रता के आधार पर भिन्न प्रतिक्रिया होती है। इस कहानी में तीन पात्र हैं जिनपे एक ही बात का अलग अलग असर हुआ है।

पुराने समय में राजा बलदेव  राय  राजा राज करते थे। वो बहुत ज्ञानी , न्याय प्रिय और समाज शास्त्री भी थे। व्यक्ति  के स्वभाव को वो देख कर ही पहचान लेते थे। उनके नयन करने की प्रक्रिया बहुत निराली थी। एक बार राजा के दरबार में चार चोर पकड़ कर लाये गए। चारों  का अपराध था चोरी। अलग अलग जगहों पर चारो व्यक्तियों पर चोरी का आरोप था। राजा के सिपाही इन अभियुक्तों  को दरबार में पेश  किया थे। अपराध सिद्ध होने पर इनको सजा मिलनी थी या आरोप झूठ साबित होने पर ये चारो मुक्त हो सकते थे।


राजा के समक्ष जब एक एक कर इन चारों अभियुक्तों को पेश किया गया तो राजा ने इन सभी को अलग सजा सुनाया जबकि अपराध सबका सामान था। यह देख कर सभी दरबारी चकित थे।

१) पहले अभियुक्त को राजा ने सजा सुनाई ने के क्रम में सिर्फ इतना कहा , तुम्हे ऐसा नहीं करना चाहिए " वह अभियुक्त चला गया

२) दूसरे अभियुक्त को राजा के समकक्ष पेश किया गया -
राजा ने उस अभियुक्त को ऊपर से नीचे  तक देखा और सिपाहियों से कहा की इसे ले जाओ अपमानित मर के छोड़ दो। राजा के सैनिक उसे अपशब्द कहकर  छोड़ दिए।
३) अभियुक्त को राजा ने चार कोड़े मारकर  छोड़ देने को कहा। चार कोड़े खाकर तीसरा अभियुक्त चला गया।
४) अब राजा के समक्ष चौथा अभियुक्त पेश हुआ। राजा बलदेव राय  ने कुछ देर तक चोर की तरफ देखा और उसे सजा सुनाया। इस चोर को सजा सुनाया गया कि "इसका मुंडन कर गधे पे बिठा कर सारे नगर में घुमाव" नगर के बच्चे इसपर कूड़ा और गन्दगी फेंके और ताली बजाएं।

राजा ने सजा सुनाने के बाद चारो अभियुक्तो के पीछे एक एक गुप्तचर लगा दिया। जो सजा के बाद इनपर हुई प्रतिक्रिया के बारे में राजा को खबर देंगे।

पहले अभियुक्त का गुप्तचर राजा के समक्ष आया और राजा से अनुमति प्राप्त कर बोला। राजन आपने जिस चोर को "तुम्हे ऐसा नहीं करना चाहिए " कहा था। वह वास्तव में चोर नहीं था उसपर चोरी का झूठा इल्जाम लगा था। वह आपके इस वाक्य से इतना आहत का की घर जाकर जहर कहकर आत्महत्या कर लिया।

 थोड़ी देर बाद दूसरे अभियुक्त का गुप्तचर आया। उसने दूसरे अभियुक्त के बारे में बताया। महाराज आपने जिस अभियुक्त  को अपमानित करके भेज दिया तथा वो भी चोर नहीं था चोर चोरी का धन इसके कुटिया के पास रखकर भाग गए थे, और ये निर्दोष  पकड़ा गया था। जब आपने उसे अपमानित करके भेजा  तो वह इतना लज्जित हुआ की लज्जा के मारे ये शहर ही छोड़ गया।

दूसरे दिन राज दरबार में तीसरे अभियुक्त का गुप्तचर आया।  गुप्तचर ने बताया महाराज आपने जिस चोर को ४ कोड़े मारकर छोड़ दिया था वो भी चोर था लेकिन उसके चोरी के अपराध भी छोटे थे। उसने अपने परिवार के भरण पोषण के लिए सेठ के बाग़ से फल चुराए थे। आपके सजा की उसपर सकारात्मक प्रतिक्रिया हुई है। अब ये प्रायश्चित के तौर पर उसी सेठ के यहाँ फलों की रखवाली कर रहा है और खुश है।

तभी चौथा गुप्तचर आया जो सज़ा के बाद चौथे चोर के गतिविधियों पर नजर रख रहा था। गुप्तचर ने कहा  महाराज जिस दिन उसको नगर में गधे पे बैठा कर घुमाया जा रहा था तब से मैं इसपर नजर रखा हूँ।
उसके  शरीर पर बच्चे मिटटी गोबर फ़ेंक रहे थे।  अपने घर से गुजरते हुए रस्ते में उसे  अपनी पत्नी दिख गयी। पत्नी को जोर से आवाज लगते हुए कहा घर पर पानी तैयार रखना अभी इन बच्चों को नगर घुमा के आ रहा हूँ।

राजा ने अपने दरबारियों से कहा इन चार अभियुक्तों पर होने वाली प्रतिक्रिया अलग अलग इसलिए हुई क्योंकि मेरे द्वारा दी गयी सजा को सबने अलग अलग तरीके से समझने की कोशिश  की।

किसी आदमी के स्वभाव को बदलने के लिए सजा का सख्त होना उतना जरूरी नहीं जितना की प्रतिक्रिया का असरदायी होना है। मैंने पहले अभियुक्त को सिर्फ इतना कहा की ये काम तुम्हारे लायक नहीं तो वह आत्महत्या कर लिया जबकि मुंडन कराकर गधे पर घुमाने वाले पर सजा को उतना असर नहीं हुआ यानि चोरी करना नहीं छोड़ा
एक ही अपराध में अभियुक्त थे चारो अपराधी, लेकिन चारों  पर प्रतिक्रिया भिन्न भिन्न हुई। अतः कहा गया है की प्रतिक्रिया जीवन की कसौटी है। जब तक आपपर किसी बात की प्रतिक्रिया नहीं होती।

इस कहानी में असली चोर कौन था

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मंगलवार, 18 अक्तूबर 2016

सत्य का बोध व्यक्ति के सामर्थ्य पर निर्भर है

सत्य का बोध व्यक्ति के सामर्थ्य पर निर्भर है

भारत में प्राचीन काल में शिक्षा व्यवस्था बहुत ही सरल और सर्व सुलभ थी। कोई निर्धन व्यक्ति धनाभाव के कारण शिक्षा से वंचित नहीं रहा। छात्र गुरु के आश्रम में रहकर शिक्षा प्राप्त करते थे। भिक्षाटन से आश्रम कर खर्च चलता था।  एक दिन गुरु जी सत्य और असत्य के सन्दर्भ में छात्रों को शिक्षा दे रहे थे। गुरु जी ने छात्रों को बताया की सत्य का बोध व्यक्ति के सामर्थ्य पर निर्भर करता है। गुरु जी के मुख से ऐसा सुन कर कुछ छात्रों को आश्चर्य हुआ की यह  कैसे हो सकता है।

गुरु जी नई फिर समझाते हुए कहा कि सत्य ही ईश्वर है और सत्य बहुत बड़ा तथा व्यापक है। सत्य के बोध के लिए सत्य के व्यापक स्वरुप को जिसने अनुभव नहीं किया वह सत्य के यथार्थ को नहीं जान सकता।  छात्रों का संशय अब भी नहीं दूर हुआ।


गुरु जी अब सभी छात्रों को हथिसार में ले गए जहा एक हाथी बंधा था। अब गुरु जी ने चार छात्रों को चुना जिन्हें ज्यादा संशय था, और उनके आँख बंधवा दिए। अब एक एक छात्र से हाथी के शरीर के एक एक भाग का स्पर्श कराया गया। और उनसे पूछा गया कि यह कौन सी वस्तु है।

१) पहले छात्र को हाथी का पूछ स्पर्श कराया गया और पूछा गया की क्या स्पर्श किये हो।
छात्र का उत्तरर तथा  ये कोई मोती रस्सी प्रतीत होती है।
२)अब दूसरे छात्र को हाथी का मोटा पैर स्पर्श कराया गया।
पूछने पर दूसरे छात्र ने बताया की वह एक पेड़ के मोटे तने का स्पर्श किया है
३) अब तीसरे छात्र को हाथी का पेट स्पर्श कराया गया और पूछा गया यह क्या है
छात्र का जबाब था  ये कोई दीवाल प्रतीत हो रहा है
४) चौथे छात्र को हाथी के कान का स्पर्श कराया गया , छात्र ने हाथी के सुपले जैसे कान को सूर्प( सुपला) समझा।

सभी छात्रों के आंख पर से पट्टी खोल दी गयी। छात्रों का संशय दूर हो गया था। गुरु जी ने छात्रों को समझते हुए कहा की सत्य का यथार्थ बोध नहीं होने से लोग संशय में एक दूसरे से बहस करते हैं। उदहारण के लिए अगर इन चरों छात्रों के आँख पर से पट्टी नहीं खोली गयी होती तो ये हाथी के बारे में अपनी अपनी राय व्यक्त कर एक दूसरे विवाद और तर्क करते।

ईश्वर के बारे में लोगों के अलग मत होंने का कारण भी लोगों  का अपना अपना इन्द्रिय सामर्थ्य और बोधगम्यता है। छात्रों  अपने को सामर्थ्यवान बनाओ अपने अंदर पात्रता लाओ  जिससे सत्य का बोध हो सके।

महाकवि तुलसी दास ने कहा था "नयन विहीन और मुकुर  मलीना, राम रूप देखहि किमी दीना " अर्थात
जिसकी दृष्टि कमजोर हो और वह चश्मा भी ऐसा लगा रखा हो जिसके शीशे गंदे हों तो वह सत्य के स्वरुप ईश्वर प्रभु राम को कैसे देख सकता है।

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सोमवार, 17 अक्तूबर 2016

किसान और तरबूज की कहानी

एक छोटे से गाँव में एक बहुत ही मेहनती किसान रहता था। एक बार उसने अपने खेत में एक विशाल तरबूज उगाई। किसान अपने तरबूज का बहुत गर्व था और वह जानता था कि, यह सबसे बड़ी तरबूज जो कभी किसी ने देखा होगा। वह टकटकी लगाए अपने तरबूज की रखवाली किया करता था और उसके बारे में सोचा करता था की इस अद्भुत फल का क्या करना है।

पहले उसने सोचा कि इसे बाजार में बेच देना चाहिए, यह उसे अच्छा लाभ देगा। लेकिन फिर उसने सोचा की क्यों न इस तरबूजे को प्रदर्शनी में रखा जाए। वह इसी तरह उधेड़ बन में लगा रहा और अंत में निर्णय किया कि क्यों न इसे राजा को उपहार स्वरुप भेंट कर दूँ। किसान इसी अच्छी सोच के साथ सो गया कि वह राजा को अद्भुत तरबूज भेंट करेगा और बदले में राजा से इनाम पायेगा।

उस राज्य का राजा बहुत दयालु था और प्रजा की देखभाल करता था अतः उसे इसी बहाने अपने राज्य मे टहलने की आदत थी। वह आम आदमी के वेश में अपने नागरिकों को देखने निकल जाता था यह सुनिश्चित करने की सभी सुरक्षित थे हैं। उस रात, राजा एक साधारण आदमी के भेष में किसान के घर से होकर गुजरा। वहां राजा ने एक बड़ा तरबूज देखा और वह इसपर इतना मोहित हो गया, की किसान के दरवाजा पर जाकर उसका दरवाजा खटखटाया।

किसान उठा और बाहर आकर पूछा, "तुम कौन हो और इस समय तुम क्या चाहते हैं?"
राजा ने कहा, "मैं एक गरीब आदमी हूं मैंने इस खेत में यह बड़ा तरबूज देखा और मैं यह तरबूज लेना चाहता हूँ।"
किसान ने कहा "तरबूज नहीं नहीं>>> मैं उसे किसी को नहीं दे सकता !!"

राजा उत्सुक हो गया और पूछा, "क्यों नहीं?? आप इससे क्या करने वाले हैं?"

किसान ने कहा, "मैं इसे अपने राजा को देने के लिए जा रहा हूँ।"

राजा ने किसान से पूछा, "यदि राजा ने इसे पसंद नहीं किया तो क्या होगा?"

"तो फिर वह नरक में जा सकता है.. !!", किसान ने तत्काल जवाब दिया।

इस बातचीत के बाद राजा चला गया, और किसान वापस सोने के लिए अपने विस्तर पर गया।
अगली सुबह, किसान अपने तरबूज के लेकर राजा के महल के पास गया। जब वह राजा को देखा, तो वह उसे पहचान गया, लेकिन बजाय भयभीत होने के और बीती रात राजा के साथ हुए बातचित से, उसने ऐसा नाटक किया जैसे कुछ नहीं जानता हो। अब वह राजा तरबूज भेंट किया और कहा, "महाराज.. यह इस देश का सबसे बड़ा तरबूज है। मैं आपके लिए भेंट स्वरुप लाया हूँ मुझे आशा है कि आप इसे पसंद करेंगे। "

राजा ने कहा, "अगर मैं इसे पसंद नहीं किया तो?"
"ठीक है, उस मामले में आप पहले से ही मेरा जवाब जानते है ..महाराज .. !! "किसान ने कहा।
किसान प्रतिक्रिया सुनकर राजा मुस्कराए और बोले, "मैं तुम्हारा उपहार स्वीकार करता हूँ"। राजा ने न केवल अपने उपहार के लिए किसान को पुरस्कृत किया, बल्कि उसकी बुद्धिमानी और वाक्चातुरता के लिए भी पुरष्कृत किया।
 सारांश बुद्धिमता और प्रतिउत्पन्नमतित्व आपको हर विषम परिस्थिति से उबार लेते हैं

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शुक्रवार, 14 अक्तूबर 2016

धूर्त और कंजूस सियार



धूर्त और कंजूस सियार
एक कंजूस सियार था।  पर्याप्त आहार होने के बाद भी वह बहुत दुबला पतला था।  उसे जो कुछ भी आहार मिलता वो कंजूसी से उसे भविष्य के लिए संचय करता।
एक बार जंगल में एक शिकारी आया। बड़ी परिश्रम से उसने एक हिरन का शिकार किया।  शिकार को बाँध कर कंधे पर लटका कर धनुष पर तीर संधान किये हुए वो किसी और शिकार की खोज में चल पड़ा।  मार्ग में उसने एक जंगली सूअर देखा। शिकारी अपना तीर धनुष सम्भाल पता तब तक सूअर काफी नजदीक चला आया।  शिकारी और सूअर में मल युद्ध शुरू हो गया। चुकी दोनों ही बलशाली थे अतः एक दूसरे को हरा पाना असम्भव प्रतीत हो रहा था। उन दोनों के आपसी संघर्ष में पैरों से कुचल कर एक सर्प मर गया। अंतत: लड़ते लड़ते दोनों मर गए। एक झाडी में छुप कर सियार ये सब देख रहा था।
धूर्त और कंजूस सियार
कंजूस सियार को एक साथ कई सम्पदा प्राप्त हुई। वह निर्णय करने लगा और मास दिवस गणित करने लगा की कौन सा आहार कितने दिन चलेगा। उसके सामने हिरण, सूअर, शिकारी और सर्प मृत दिख रहे थे।  वह अपने कंजूसी के पैमाने से यह गणना करने में व्यस्त था की कौन से जीव का मांस कितने दिन का आहार है। उसने अपने गणित से यह पाया की एक महीने शिकारी का मांस का आहार चलेगा, हिरण और सूअर दो महीने के लिए पर्याप्त हैं, और मृत सर्प का मांस मैं एक दिन खा लूंगा। कंजूस धूर्त सियार ने सोचा कि अगर शुरुआत कल से करूँ तो एक दिन का और आहार बढ़ जायेगा। यह सोच कर कंजूस ने धनुष की डोर को ही चबा कर रात काटने का निश्चय किया। इसका वर्णन संस्कृत के एक सुन्दर श्लोक में इस प्रकार है।
"मासमेकम नरो याति, द्वौ मासौ मृगसुकरऔ।
 
अहिरेको दिनों याति अद्य भक्षेत् धनेर्गुणम
ऐसा सोच कर जैसे ही वो धनुष की प्रत्यंचा को दाँतों से खींचा प्रत्याचा में लगा तीर उसके गले में बिध गया और उस कंजूस के प्राण पखेरू उड़ गए।


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गुरुवार, 13 अक्तूबर 2016

दूसरे का बंधन खोलने के लिए खुद बंधन मुक्त होना जरुरी

भागवत के कथा के बारे में हम सभी जानते हैं कि ध्यान पूर्वक इसका श्रवण करने से व्यक्ति मुक्त हो जाता है। उस व्यक्ति को परम पद मोक्ष की प्राप्ति होती है। एक बार एक भागवत कथा वाचक अपने शिष्य को कथा सुना रहे थे। कथा सुनाने के पश्चात स्रोता को वह लाभ नहीं मिला जो परीक्षित को मिला था। स्रोता को अभी भी संसार के विषय बंधन में जकड़े हुए थे। स्रोता ने अपने कथा वाचक गुरु से इसका कारण पूछा।
गुरु भी इसका रहस्य नहीं जान पाए अतः उन्होंने अपने गुरु जी के पास इस समस्या का समाधान जानने के लिए जाने का निश्चय किया। भागवत कथा वाचक अपने शिष्य के साथ गुरु आश्रम में पहुंचे। वहाँ पहुँच कर कथा वाचक गुरु ने अपने गुरु को सादर प्रणाम किया, और भागवत के कथा सुनने से शिष्य को कोई लाभ नहीं होने का कारण पूछा।

गुरु जी ने इन दोनों अतिथियों का यथोचित सत्कार किया। उसके उपरांत अपने शिष्यों से कहकर दोनों के के हाथ पैर बंधवा दिए। अब गुरु से कहा गया की आपका शिष्य बंधन में है इसका बंधन खोलिये। इसपर कथा वाचक गुरु ने कहा मैं तो खुद बंधन में हुए मैं कैसे वंधन खोल सकता हूँ। भागवत कथा वाचक गुरु के शंका का समाधान हो गया था। गुरु ने अपने शिष्य गुरु को समझते हुए कहा जो व्यक्ति खुद मुक्त नहीं है वो किसी को मुक्त नहीं कर सकता। तुम अपने को और तपाओ जब तुम्हे लगे कि तुम्हे कोई विषयों  का वंधन नहीं जकड रहा तो तुम भी भगवत कथा के माध्यम से अपने भक्त को विषय विकारों से मुक्त कराकर मोक्ष दिला सकते हो।

राजा परीक्षित को महान तपस्वी शुकदेव जी ने भागवत का कथा सुनाया था। शुकदेव जी खुद बंधन मुक्त थे तभी जाकर परीक्षित को कथा श्रावण का यथोचित लाभ हुआ।     

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मंगलवार, 11 अक्तूबर 2016

क्यों किया जा रहा रावण को महिमामंडित

रावण का महिमामंडन क्यों 

रावण एक खलनायक था। रामायण की पूरी कथा में राम को नायक और रावण को खलनायक बताया गया है। आजकल कुछ लोग रावण को  महिमामंडित करने में लगे हैं। ये बामपंथी सोच सनातन धर्म के लिए बहुत चिंता का विषय है। सनातन धर्म को छति  पहुँचाने के लिए विधर्मियों ने बहुत गहरी साजिस चली है। जरा सोचिये अब तक खलचरित्र के रूप में कुख्यात रावण को अब महिमंडित क्यों किये जा रहा है।

कई कुत्सित मानसिकता वाले लोग आजकल रावण को माहज्ञानी, महापंडित, कुल का गौरव बढ़ने वाला और देश भक्त बताते हैं। अगर हम किसी खलनायक को महिमामंडित कर रहे हैं तो कही न कही हम राम के प्रति उदासीन होते जा रहे हैं। रावण की बड़ाई में निकला  आप  के मुख से एक स्वर राम के प्रति आपकी निष्ठा को काम कर देता है। 

आइये  रावण से सम्बंधित कुछ  प्रमुख बिंदुओं पर प्रकाश डालते हैं- >

१) रावण महाज्ञानी नहीं अज्ञानी था ->
रावण को महाज्ञानी मानाने वाले लोग  ये भूल जाते हैं कि ज्ञान की परिभाषा क्या है ? ज्ञान शुभ कर्म करने की प्रेरणा  देता है। अगर आप शुभ कर्म नहीं कर रहे तो आप निश्चित ही अज्ञानी है। राक्षस स्वभाव वश रावण के शुभ  कर्म नहीं थे, अतः रावण अज्ञानी था। भगवान को ज्ञान का स्वरुप बताया गया है,"ज्ञान रूपी हरि भगवान् का संबोधन आया है। अब जब रावण उस ज्ञान रूपी भगवान् से द्वेष करता था तो ज्ञानी कैसे हुआ।
२) रावण के कुल का गौरव नहीं बढ़ाया उससे कुल की ख्याति का ह्रास हुआ ->
रावण को कुछ मतिमंद लोग मानते हैं की उसने कुल की ख्याति बढ़ाई। राक्षसों की कीर्ति रखने के लिए राम के सामने आत्म सपर्पण नहीं किया बल्कि युद्ध किया। उनलोगों की जानकारी के लिए बता दूँ की रावण ने अपने कुल के गौरव को कम किया इसके प्रमाण में हनुमान जी रावण को समझते हुए कहते हैं। -> "ऋषि पुलस्त्य जसु  विमल मयंक तेहि शशि महु जनि होहु कलंक" 

३) कुछ लोगों के अनुसार राम ने अपने बहन के अपमान का बदला लेने के लये सीता का हरण किया।
आजकल रावण को महिमामंडित किये जाने के दुष्परिणाम से कुछ लडकिया अपने लिए रावण जैसे भाई की कामना करने लगी हैं। इन मतिमंद लड़कियों का तर्क है की रावण ने अपने बहन की रक्षा की तथा सूर्पनखा के अपमान  का बदला लिया। रावण ने अपने बहन की रक्षा का ख्याल किया होता तो  सूर्पनखा स्वेच्छाचारी न बनी होती और राम के पास विवाह प्रस्ताव का हठ लेकर  नहीं गयी होती। सूर्पनखा का लक्ष्मण न तब नाक काटा  जब वह सीता की तरफ मुह फाड़कर खाने को दौड़ी। राम ने जब अपने को शादीशुदा बताया और पत्नी रहते दूसरी शादी नहीं करने की प्रतिबद्धता बताया, तो सूर्पनखा ने राम को स्त्री विहीन करना चाहा। नाक  कटने  के बाद सूर्पनखा अगर रावण से सभी बात सही सही बता देती तो रावण राम से युद्ध नहीं करता शायद सूर्पनखा को ही डाँटता।
४) रावण देश भक्त नहीं था
देशभक्त राजा की पहचान होती है कि वो अपने प्रजा के तुच्छ से तुच्छ स्वार्थ के लिए अपने महान लाभ का त्याग कर दे। रावण अपने प्रजा के साथ इस बात का ख्याल नहीं रखा। रावण अपने तुच्छ स्वार्थ एक स्त्री के लोभवश अपने समस्त प्रजाजन का नाश करा दिया। ये रावण का देश द्रोह था। सच पूछो तो रावण अपने बहन के अपनान का बदला लेने  के लिए सीता का अपहरण नहीं किया था, बल्कि वह अपने स्त्रीलोलुपता के कारण ऐसा किया था।

सनातन धर्म के अनुयायियों आप सावधान हो  जाओ आपको प्रभु राम से विमुख करने के लिए बामपंथियों और विधर्मियों की ये बहुत बड़ी साजिस है जिसके तहत रावण को महिमामंडित किया जा रहा है उसकी पूजा की जा रही है तथा देश के कई हिस्सों को रावण का मंदिर भी बनाया जा रहा है        


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